खलिहान से जब अनाज उठ जाता था, तब शुरू होता था ‘सिल्ला बीनने’ का मौसम। अनाज उठने के बाद भी ज़मीन में दाने बिखरे रह जाते थे। उन दानों को एक-एक करके चुनना .. उन्हें अपनी छोटी-सी झोली में भरना . . . यह काम हम बच्चों को मिलता था, जब हम बहुत छोटे थे। एक-एक दाना बीनते बीनते आधा किलो, कभी एक किलो तक अनाज इकट्ठा हो जाता था। उन बीने हुए दानों को बाज़ार में बेचने के बजाय हमारी माँ, जिन्हें मैं प्यार से जीजी कहता था, हमसे ही खरीदती थीं। और बदले में हमें कुछ पैसे देती थीं… शायद बाज़ार भाव से भी थोड़ा ज़्यादा। उन पैसों पर हमारा पूरा अधिकार होता था। मैं उन्हें रोज़ अलग-अलग जगह छिपाकर रखता था, ताकि कोई ढूँढ न सके। और फिर… हम इंतज़ार करते थे गणगौर के मेले का। यह काम हमारे लिए जितना रोमांचक था, उतना ही शिक्षाप्रद भी। एक-एक दाने की कीमत समझ आती थी…कड़ी मेहनत के बाद पैसे कैसे मिलते हैं, यह अहसास होता था…और यह भी कि इस दुनिया में कुछ भी व्यर्थ नहीं, हर चीज़ का अपना मूल्य है। मुंडिया के पास एक छोटा-सा गाँव था, सालिमपुर। बस बीच में एक नदी का फासला था। इस मौसम में नदी का पानी कम होता था, इसलिए उसे ...
Poetry is a timeless and powerful medium for expressing emotions, offering a gentle balm for the soul in times of stress. When feelings run deep, words naturally flow into verses or melodies, bringing serenity to the heart and etching precious memories onto the canvas of life. Through poetry, we share love, warmth, and connection one heartfelt line at a time. Umakant Vashisth