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Showing posts from September, 2025

ई-अवशेषों का पुनर्जन्म - A poem about revolution in sustainability E-Waste recycling ,

ई-अवशेषों का पुनर्जन्म ई-अवशेषों का भी मुक़द्दर बदल सकता है, टूटे उपकरणों में भी नव अंकुर पल सकता है। लोहे की नीरव देह में हरित कली मुस्काई, मौन पड़ी मशीनों में फिर जीवन-धुन समाई। जहाँ कभी थे तार, सर्किट और धातु के निशान, आज वहीं महक उठा है हरियाली का वरदान। ई-अवशेषों ने सिखलाया , कुछ भी नहीं बेकार, हर अंतिम पड़ाव में छिपा होता नव संसार। जो कल था परित्यक्त, आज सृजन सँवारता है, हर जंग लगा कण भी, उम्मीदें सँजोता है। आओ हम भी देखें हर टूटन में नवप्रभात, कुछ भी नहीं व्यर्थ जग में, यदि दृष्टि नई हो साथ। हर ई-अवशेष के अंतर में सोया है नवप्राण, हर अंत की गोद से जन्मे, जीवन का नव विहान।

चल अकेला

  आया था इस जग में अकेला, ना कोई अपना, ना कोई मेला। फिर अनगिन रिश्तों के फूल खिले, जीवन-पथ पर अपने मिले। हर संबंध ने हौसला बढ़ाया, हर आँसू को चुपके सहलाया। हँसी भी बाँटी, ग़म भी बाँटे, अपनेपन के दीपक थे जलते। कुछ रिश्ते समय की धूल हुए, कुछ सपने अधूरे फूल हुए। कुछ चेहरे यादों में बस गए, कुछ पल आँखों से बरस गए। फिर भी जीवन यही सिखाता, हर बिछड़ना कुछ कह जाता। यादों की खुशबू साथ रहती, हर धड़कन में चुपचाप बहती। दुःख भी रिश्तों से, सुख भी वही, जीवन का सार छिपा है यहीं। मिलना-बिछड़ना जग की रीत, इन्हीं में बसती जीवन-गीत। जब राह लगे सुनसान, अकेली, मत होने देना हिम्मत ढीली। जो साथ मिले, प्रभु का वरदान, हर अपना उसका ही सम्मान। कर्मपथ पर बढ़ते ही जाना, सत्य, प्रेम का दीप जलाना। प्रभु का हाथ जो संग रहेगा, हर दुःख, हर झमेला मिट जाएगा। उमाकान्त