आया था बिल्कुल अकेला,
ना कोई अपना, ना कोई मेला।
फिर अनगिन रिश्तों की डोर जुड़ गई,
जीवन की राह संग-संग मुड़ गई।
संबंधों ने हर दर्द संभाला,
रिश्तों से हर क़दम था निराला।
कुछ दोस्त, कुछ रिश्ते टूट गए,
बिखरे पत्तों से सपने छूट गए।
फिर भी समय हर घड़ी पुकारे,
यादों के दीपक मन में सँवारे।
दुःख भी उनमें, सुख भी वही,
जीवन का सार छुपा है यहीं।
राह सुनसान, चल अकेला,
साथ मिले,
तो प्रभु का मेला।
कर्म किए जा, मत होना ढीला,
संग प्रभु के,
कटे हर पीड़ा और झमेला।
उमाकान्त
Comments
Post a Comment