आया था इस जग में अकेला,
ना कोई अपना, ना कोई मेला।
फिर अनगिन रिश्तों के फूल खिले,
जीवन-पथ पर अपने मिले।
हर संबंध ने हौसला बढ़ाया,
हर आँसू को चुपके सहलाया।
हँसी भी बाँटी, ग़म भी बाँटे,
अपनेपन के दीपक थे जलते।
कुछ रिश्ते समय की धूल हुए,
कुछ सपने अधूरे फूल हुए।
कुछ चेहरे यादों में बस गए,
कुछ पल आँखों से बरस गए।
फिर भी जीवन यही सिखाता,
हर बिछड़ना कुछ कह जाता।
यादों की खुशबू साथ रहती,
हर धड़कन में चुपचाप बहती।
दुःख भी रिश्तों से, सुख भी वही,
जीवन का सार छिपा है यहीं।
मिलना-बिछड़ना जग की रीत,
इन्हीं में बसती जीवन-गीत।
जब राह लगे सुनसान, अकेली,
मत होने देना हिम्मत ढीली।
जो साथ मिले, प्रभु का वरदान,
हर अपना उसका ही सम्मान।
कर्मपथ पर बढ़ते ही जाना,
सत्य, प्रेम का दीप जलाना।
प्रभु का हाथ जो संग रहेगा,
हर दुःख, हर झमेला मिट जाएगा।
उमाकान्त

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