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Showing posts from April, 2025

काश... मेरी माँ आज भी होती,

काश... मेरी माँ आज भी होती काश... मेरी माँ आज भी होती, अपनी पोती की शादी में ममता से भीगती, कभी सँवारती, कभी दुल्हन-सी सजाती, कभी भीगी पलकों से मुस्काती,  कभी नज़रें चुराकर इठलाती। वर को देख चुपके से मुस्काती, स्नेह से उसके माथे को चूम दुलराती, “ख़याल रखना मेरी बच्ची का...” कहकर, ममता की गठरी में कुछ दुआएँ बाँध जाती। काश... मेरी माँ आज भी होती, तो थककर मैं उसके आँचल में सिमट जाता, दुनिया की आपाधापी से पल भर को दूर, उसकी बाँहों में अपना हर बोझ भूल जाता। जब ज़िम्मेदारियाँ मन पर भारी होतीं, वो माथे पर ममता का चुम्बन रख देती, बिना पूछे मेरे मन की पीड़ा पढ़ लेती, और पल भर में हर चिंता हर लेती। हर रस्म में उसकी आँखें दमकतीं, फेरे देखकर पलकें उसकी भीग जातीं, “कमियाँ मत देखना, बस दुआएँ देना...” कहती, और अपनी दुआओं से हर राह सँवार जाती। उसकी मौजूदगी में कोई ऊँचा स्वर न करता, वो रूठे मनों में भी स्नेह जगा देती, किसी की छोटी-सी भूल को हँसकर टालती, और टूटते रिश्तों में फिर से मिठास भर देती। विदाई की उस करुण घड़ी में, वो मुझे अपने सीने से लगा लेती, मेरी छलकती आँखों को आँचल से प...

आओ मिलकर गीत रचें

आओ मिलकर गीत रचें ग़ज़ल ढली रात, फिर सवेरा भी निकल रहा है, हर एक ज़ख्म चुपके से अब सँभल रहा है। ग़मों के समंदर चाहे बहुत गहरे रहे, उम्मीद का हर इक साहिल बदल रहा है। कुछ लोग बिछड़ गए तो ये गिला भी नहीं, उनकी दुआ का दीपक अभी भी जल रहा है। न शिकवा किसी से है, न किसी बात का मलाल, वक़्त अपने ढंग से सब कुछ बदल रहा है। चलो कि फिर नई राह कोई तलाश करें, हर एक मोड़ पर मंज़िल का दिल मचल रहा है। जो गिर के फिर उठा, वही मुसाफ़िर कहलाया, हर एक ठोकर से इंसाँ सँभल रहा है। आओ मिलकर गीत रचें, दिल से दिल मिलाएँ, हर एक सुर में नया हौसला पनप रहा है। 'उमाकांत' हौसला मत कभी हारना तुम, तुम्हारे साथ हर पल ये कारवाँ चल रहा है। उमाकान्त