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Showing posts from May, 2026

52 बरस – मैं भी और तुम भी | विवाह, प्रेम और जीवन यात्रा पर हिंदी कविता; A husband to wife a love letter

  Visit: Kagaj Ke Patte – https://kagajkepatte.blogspot.com/   🌸 बावन बरस,मैं भी और तुम भी! 🌸 कुछ कविताएँ कल्पना से जन्म लेती हैं, और कुछ जीवन स्वयं लिखता है।  यह कविता उन्हीं अनगिनत पलों का संकलन है, जो दो लोगों ने साथ जीए संघर्ष, सपने, प्रेम, परिवार, बिछड़ाव, विश्वास और ईश्वर के आशीर्वाद के साथ।   52 बरस – मैं भी और तुम भी" केवल एक वैवाहिक जीवन की कहानी नहीं, बल्कि उस सफ़र का उत्सव है जहाँ दो लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे का संसार बन जाते हैं।   आज हम बावन के हो गए ,   मैं भी , तुम भी ! पाँच दशक और दो बरस ,  मैं भी , तुम भी ! छब्बीस बरस 2000 से पहले ,  छब्बीस बरस 2000 के बाद , पलकों में जैसे सिमट गए , मैं भी , तुम भी। गाँव की पगडंडी से निकले , कस्बों की गलियों से गुजरे , शहरों की धड़कन तक पहुँचे , फिर राजधानी के सपने सँवरे । शहर बदलते रहे , नए रिश्ते बनते रहे , मंजिलें चाहे जितनी बदली ,   संग तेरे अरमान नए बुनते रहे। आज हम बावन के हो गए , मैं भी , तुम...

तुझ में राम मुझ में राम - एक भावपूर्ण राम भजन | आत्मा में बसे श्रीराम I Tujh Mein Ram Mujh Mein Ram – Hindi Ram Bhajan | Spiritual Hindi Poem

🌿 इस राम भजन के बारे में "तुझ में राम, मुझ में राम" केवल एक भजन नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म की उस भावना का सरल और मधुर स्वरूप है जो कहता है कि ईश्वर हर जीव में विद्यमान हैं। यह रचना हमें याद दिलाती है कि जब हम अपने भीतर और दूसरों में श्रीराम के दिव्य स्वरूप को पहचानते हैं, तब भेदभाव समाप्त हो जाता है और प्रेम, करुणा, विश्वास तथा अपनापन जीवन का आधार बन जाते हैं। "राम-राम" केवल अभिवादन नहीं, बल्कि दो आत्माओं के मिलन का आध्यात्मिक संदेश बन जाता है। सरल शब्दों और सहज भावों में लिखा गया यह भजन भक्ति, मानवता और आत्मिक एकता का संदेश देता है। यदि यह रचना आपके हृदय को स्पर्श करे तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें, ताकि श्रीराम का यह प्रेम-संदेश अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। तुझ में राम मुझ में राम हम मिले तो बने राम राम मन की धड़कन, श्वास में राम, हर इक क्षण का विश्वास है राम। तेरी मुस्कान में झलके जो, वही मेरा उल्लास है राम। तेरे संग जो राह चलूँ, हर पथ हो जाता धाम। दूरी का फिर अर्थ कहाँ, जब संग-संग हों श्रीराम। नेत्र बंद कर जब सोचूँ, भीतर गूंजे एक ही न...