काश... मेरी माँ आज भी होती
काश... मेरी माँ आज भी होती,
अपनी पोती की शादी में मोह से भीगती।
कभी उसे सँवारती, कभी दुल्हन-सी सजाती,
कभी भीगी पलकों से मुस्कराती, कभी नजरें फेर इठलाती।
जयेश को देख हौले से मुस्काती,
चुपके से उसका माथा चूम दुलराती,
'ख्याल रखना मेरी बच्ची का'
धीमे से कानों में ये प्यार भरी सीख सुनाती।
काश... मेरी माँ होती,
तो मैं भी थक कर उसके आँचल में सिमट जाता,
भीड़-भाड़ से बचकर उसके सीने से लग जाता।
जब जिम्मेदारियाँ बोझ बनतीं,
वो एक चुम्बन से सब हल्का कर देती।
हर रस्म में उसकी आँखों की चमक कुछ और होती,
फेरे देख उसकी पलकें भीग-सी जातीं।
वो कहती, 'कमियाँ नहीं, दुआएँ देना',
हर अनहोनी को अपने आशीर्वादों से ढँक लेती।
कोई उसकी मौजूदगी में ऊँचा स्वर न उठाता,
और वह, हर चूक को हँसते-हँसते माफ कर जाती।
विदाई की घड़ी में,
वो मुझे कसकर थाम लेती,
मेरी बहती आँखों को अपने आँचल से चुपके से पोंछ लेती।
काश... मेरी माँ होती,
तो मैं यूँ चुपचाप न रोता,
उसकी बाहों में अपने सपनों को सहेज लेता।
आज जब मेरी बेटी डोली में बैठेगी,
मेरा दिल चुपके से उसकी ममता को खोजेगा।
काश... मेरी माँ होती,
तो आज भी मेरी दुनिया पूरी होती।
उमाकान्त
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