काश... मेरी माँ आज भी होती
वर को देख चुपके से मुस्काती,
स्नेह से उसके माथे को चूम दुलराती,
“ख़याल रखना मेरी बच्ची का...” कहकर,
ममता की गठरी में कुछ दुआएँ बाँध जाती।
काश... मेरी माँ आज भी होती,
तो थककर मैं उसके आँचल में सिमट जाता,
दुनिया की आपाधापी से पल भर को दूर,
उसकी बाँहों में अपना हर बोझ भूल जाता।
जब ज़िम्मेदारियाँ मन पर भारी होतीं,
वो माथे पर ममता का चुम्बन रख देती,
बिना पूछे मेरे मन की पीड़ा पढ़ लेती,
और पल भर में हर चिंता हर लेती।
हर रस्म में उसकी आँखें दमकतीं,
फेरे देखकर पलकें उसकी भीग जातीं,
“कमियाँ मत देखना, बस दुआएँ देना...” कहती,
और अपनी दुआओं से हर राह सँवार जाती।
उसकी मौजूदगी में कोई ऊँचा स्वर न करता,
वो रूठे मनों में भी स्नेह जगा देती,
किसी की छोटी-सी भूल को हँसकर टालती,
और टूटते रिश्तों में फिर से मिठास भर देती।
विदाई की उस करुण घड़ी में,
वो मुझे अपने सीने से लगा लेती,
मेरी छलकती आँखों को आँचल से पोंछकर,
मेरे भीतर छिपा हर आँसू चुप करा देती।
काश... मेरी माँ आज भी होती,
तो मैं यूँ अकेला बैठकर न रोता,
उसकी गोद में सिर रखकर जी भर लेता,
और अपने मन का हर दर्द कह देता।
आज जब मेरी बेटी डोली में बैठेगी,
मेरा मन उसकी ममता को तरसेगा,
उसकी विदाई के आँसुओं के बीच,
माँ का आँचल हर पल मुझे याद आएगा।
काश... मेरी माँ आज भी होती,
तो इस घर की खुशियों में उसकी हँसी भी होती,
मेरी बेटी की विदाई में आँखें नम तो होतीं,
पर माँ की दुआओं से मेरी खुशियाँ दोगुनी होतीं।

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