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Showing posts from 2026

बावन बरस, मैं भी और तुम भी!

 🌸  बावन बरस,मैं भी और तुम भी! 🌸 01 आज हम बावन के हो गए ,  मैं भी , तुम भी ! पाँच दशक और दो बरस , मैं भी , तुम भी ! छब्बीस बरस 2000 से पहले , छब्बीस बरस 2000 के बाद , पलकों में जैसे सिमट गए , मैं भी , तुम भी। - 02  गाँव की पगडंडी से निकले , कस्बों की गलियों से गुजरे , शहरों की धड़कन तक पहुँचे , फिर राजधानी के सपने सँवरे । शहर बदलते रहे ,       नए रिश्ते बनते रहे , मंजिलें चाहे जितनी बदली , संग तेरे अरमान नए बुनते रहे। आज हम बावन के हो गए , मैं भी , तुम भी !--- - 03 आज से ठीक छब्बीस बरस पहले , हम दोनों भी छब्बीस   के , नए सहस्त्राब्दी की देहरी पर , तेरी आँखों में देखे थे सपने सुनहरे सफ़र के। रिश्तों को जोड़ना , निभाना , हर मन से मन का सेतु बनाना , तुमने घर को घर बना दिया , प्रेम का तीरथ , मन्दिर बना दिया।   आज हम बावन के हो गए , मैं भी , तुम भी !--- -04 माँ की कमी बचपन से थी , मन ...

तुझ में राम मुझ में राम

तुझ में राम मुझ में राम हम मिले तो बने राम राम मन की धड़कन, श्वास में राम, हर इक क्षण का विश्वास है राम। तेरी मुस्कान में झलके जो, वही मेरा उल्लास है राम। तेरे संग जो राह चलूँ, हर पथ हो जाता धाम। दूरी का फिर अर्थ कहाँ, जब संग-संग हों श्रीराम। नेत्र बंद कर जब सोचूँ, भीतर गूंजे एक ही नाम। तू भी वही, मैं भी वही, सबमें बसते हैं राम। तुझ में राम मुझ में राम हम मिले तो बने राम-राम 🙏

गणगौर मेला और मीठे-मीठे गब्बे

खलिहान से जब अनाज उठ जाता था, तब शुरू होता था ‘सिल्ला बीनने’ का मौसम। अनाज उठने के बाद भी ज़मीन में दाने बिखरे रह जाते थे।  उन दानों को एक-एक करके चुनना .. उन्हें अपनी छोटी-सी झोली में भरना . . . यह काम हम बच्चों को मिलता था, जब हम बहुत छोटे थे। एक-एक दाना बीनते बीनते आधा किलो, कभी एक किलो तक अनाज इकट्ठा हो जाता था। उन बीने हुए दानों को बाज़ार में बेचने के बजाय हमारी माँ, जिन्हें मैं प्यार से जीजी कहता था, हमसे ही खरीदती थीं। और बदले में हमें कुछ पैसे देती थीं… शायद बाज़ार भाव से भी थोड़ा ज़्यादा। उन पैसों पर हमारा पूरा अधिकार होता था। मैं उन्हें रोज़ अलग-अलग जगह छिपाकर रखता था, ताकि कोई ढूँढ न सके। और फिर… हम इंतज़ार करते थे गणगौर के मेले का। यह काम हमारे लिए जितना रोमांचक था, उतना ही शिक्षाप्रद भी। एक-एक दाने की कीमत समझ आती थी…कड़ी मेहनत के बाद पैसे कैसे मिलते हैं, यह अहसास होता था…और यह भी कि इस दुनिया में कुछ भी व्यर्थ नहीं, हर चीज़ का अपना मूल्य है। मुंडिया के पास एक छोटा-सा गाँव था, सालिमपुर। बस बीच में एक नदी का फासला था।  इस मौसम में नदी का पानी कम होता था, इसलिए उसे ...