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खींची मैंने रेखा पे रेखा

 पूजा बत्ती करली मैंने

 मंदिर भोग लगा आया,

लोगों को मन्तर आता नहीं

मैंने तो मन्तर भी गाया


 कर दान रुपे दो मंदिर में,

मैं दानवीर भी कहलाया।

दोष दिखें  औरों में मुझको ,

मेरी तो निर्दोषी काया ,


 नही क्रोध मुझ में थोड़ा भी ,

पर औरों पे गुस्सा आया ,

अहम नही मुझ में बोलो

मैंने तो मैं को ही पाया


ज्ञान बहुत मुझ में मगर

औरो में भूसा देखा

अहम के जंजाल में फंस,

खींची मैंने रेखा पे रेखा

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मौन की भाषा

खोज में निकला था, बाहर उमाकान्त, शब्दों में सच था, पर मन था शान्त। तर्कों के साए में भटका बहुत, पर सत्य न पाया, रहा बस विभ्रांत। बुद्ध ने कहा, “दीपक स्वयं बनो,” विवेकानंद बोले, “खुद को पहचानो।” कृष्णमूर्ति की वाणी गूंजे कहीं, “जो ज्ञात है, बस भ्रम है यहीं।” सत्य न ग्रंथों में, न शास्त्रों की रीत, न वाद-विवाद, न तर्कों की जीत। यह तो बस मौन की भाषा में बसता, हृदय की गहराइयों में ही हंसता। जो भीतर उतरे, वही जान पाए, जो खुद को समझे, वही सत्य पाए। खोलो यह पर्दा, हटाओ यह धुंध, सत्य वहीं है, जहां हो अनुगंध। उमाकान्त

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