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अब ससुराल संवारना

 दोहा : 


बिटिया सुख की छाँव है, बिटिया जीवन प्राण

आज समर्पण कर रहे,  करके कन्यादान

गीत

ओ समधी जी......ओ समधन जी .....

हम पर इक,         उपकार करो ।

बड़ा कठिन है, ये क्षण जीवन का , 

दिल से दिल का,         दान करो ।।

बिटिया हमारी लाडली , सबके आँखों की ज्योति है।  

हर सुख-दुःख में संग खड़ी, ममता की महक निराली है।।    

घर आँगन की किलकारी, हर दुःख की मुस्कान बनी।  

पापा के  साँसों की धड़कन,  माँ के मन की प्रीति बनी।। 

ओ समधी जी......ओ समधन जी .....

जब मिल जाये शगुन हो जाये , हर घर में खुशियां भर जाये।  

नए काम की शुरुआत में,         स्वयं खड़ी महूरत बन जाये।।  

आज सजी है दुल्हन बन के,     नयन नीर से भरे हुए ।  

तेरे सपनों का हर उजियारा, अब नए आंगन सँवारे हुए ।।  

ओ समधी जी......ओ समधन जी .....

जग की रीत पुरानी है ये,        अब ससुराल सँवारना ।

हर रिश्ता अपना मानकर, हर दिल को तुम निखारना ।।  

वो भी निभाएगी हर रिश्ता,    संग तुम्हारे बढे कदम ।

सुख-दुःख में साथी बनकर,  चलना मिलकर हर दम ।।  

ओ समधी जी......ओ समधन जी .....

मिलकर दोनों लिखो कहानी, प्रेम विश्वास समर्पण की ।

सुख से भर दो जीवन नौका, जैसे सरिता गंगाजल की ।। 

ओ समधी जी......ओ समधन जी ....


दोहाः 

दाम्पत्य-पथ पर साथ हों, प्रेम स्नेह आभार ।

जीवन नाम चलाइए,     स्नेह भरे संसार ॥

समधी समधन आपसे,  माँगे यह उपहार ।

बिटिया को अपनाइए,  रखिए सदा संवार ॥

वर-वधु अब संग है, प्रेम सुगंध अपार ।

जयमाल की स्वीकृति, खुले हृदय के द्वार ॥

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