विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो हृदयों के स्नेहपूर्ण मिलन का उत्सव है। कन्यादान के पावन क्षण में माता-पिता के मन में उमड़ती भावनाओं को शब्द देना आसान नहीं होता। "ओ समधी जी... ओ समधन जी..." उसी भावभूमि से जन्मी एक मौलिक रचना है, जिसमें बेटी के प्रति असीम स्नेह, उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना और समधी-समधन से उसे प्रेमपूर्वक अपनाने का विनम्र अनुरोध व्यक्त किया गया है।
यह गीत केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि विश्वास, अपनत्व और रिश्तों की गरिमा का भावपूर्ण संदेश है। आशा है कि इसकी पंक्तियाँ आपको भी उन अनमोल क्षणों से जोड़ देंगी, जहाँ विदाई के आँसू और नए जीवन की मुस्कान एक साथ खिल उठते हैं।
प्रस्तुत हैं इस भावपूर्ण विवाह गीत के सम्पूर्ण बोल
दोहा :
बिटिया सुख की छाँव है, बिटिया जीवन प्राण
आज समर्पण कर रहे, करके कन्यादान
गीत
ओ समधी जी......ओ समधन जी .....
हम पर इक, उपकार करो ।
बड़ा कठिन है, ये क्षण जीवन का ,
दिल से दिल का, दान करो ।।
बिटिया हमारी लाडली , सबके आँखों की ज्योति है।
हर सुख-दुःख में संग खड़ी, ममता की महक निराली है।।
घर आँगन की किलकारी, हर दुःख की मुस्कान बनी।
पापा के साँसों की धड़कन, माँ के मन की प्रीति बनी।।
ओ समधी जी......ओ समधन जी .....
जब मिल जाये शगुन हो जाये , हर घर में खुशियां भर जाये।
नए काम की शुरुआत में, स्वयं खड़ी महूरत बन जाये।।
आज सजी है दुल्हन बन के, नयन नीर से भरे हुए ।
तेरे सपनों का हर उजियारा, अब नए आंगन सँवारे हुए ।।
ओ समधी जी......ओ समधन जी .....
जग की रीत पुरानी है ये, अब ससुराल सँवारना ।
हर रिश्ता अपना मानकर, हर दिल को तुम निखारना ।।
वो भी निभाएगी हर रिश्ता, संग तुम्हारे बढे कदम ।
सुख-दुःख में साथी बनकर, चलना मिलकर हर दम ।।
ओ समधी जी......ओ समधन जी .....
मिलकर दोनों लिखो कहानी, प्रेम विश्वास समर्पण की ।
सुख से भर दो जीवन नौका, जैसे सरिता गंगाजल की ।।
ओ समधी जी......ओ समधन जी ....
दोहाः
दाम्पत्य-पथ पर साथ हों, प्रेम स्नेह आभार ।
जीवन नाम चलाइए, स्नेह भरे संसार ॥
समधी समधन आपसे, माँगे यह उपहार ।
बिटिया को अपनाइए, रखिए सदा संवार ॥
वर-वधु अब संग है, प्रेम सुगंध अपार ।
जयमाल की स्वीकृति, खुले हृदय के द्वार ॥
बहुत खूब
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