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माँ-बाप का जीवन, त्याग की कहानी

 प्रेम का असली अर्थ

माँ-बाप का जीवन, त्याग की कहानी,

हर सुख-स्वप्न छोड़े, बस बच्चों की रवानी।

हर चाहत भूले, अपना सब कुछ खोया,

उनके लिए हर दिन, हर सपना संजोया।


प्रेम ना है आशा, ना कोई अधिकार,

ये बस है देना, निस्वार्थ अपार।

आभार और समझ जब रिश्तों में आए,

सुख-शांति के दीपक जीवन में जगमगाए।


बच्चे समझें हक़, बस लेते ही जाएँ,

पर कर्म से रिश्ते की गहराई बढ़ाएँ।

ऋण ये नहीं, है ईश्वर का वरदान,

सम्मान ही इसका है सच्चा प्रमाण।


माता-पिता भी समझें ये सदा,

हर वक्त साथ रहना नहीं है वादा।

अपेक्षा हो सीमित, विश्वास रहे साथ,

यही है रिश्तों की सच्ची परिभाषा।


प्रेम ना है आशा, ना कोई अधिकार,

ये बस है देना, निस्वार्थ अपार।

आभार और समझ जब रिश्तों में आए,

सुख-शांति के दीपक जीवन में जगमगाए।


निःस्वार्थ और प्रेम हैं गहरे राज़,

आत्मचिंतन से खुलते इनके अंदाज़।

आशा-अधिकार की बाँधो सीमा,

तभी निखरेगी जीवन की गरिमा।


उमाकान्त

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