ढली रात, फिर सवेरा हुआ,
काली घटाएँ छँटने लगीं।
ग़म के सागर गहरे सही,
पर खुशियाँ भी फिर उछलेंगी।
कुछ साथी छूटे राहों में,
पर यादें उनकी मुस्काएँगी।
उनकी सीख, उनके अफ़साने,
ज़िंदगी को फिर रंग लाएँगी।
चलो नया कोई रस्ता खोजें,
बैठें मिलकर, साथ में चलें।
जीवन के रंग बिखरें ऐसे,
जैसे बहारें हर सू खिलें।
हर मोड़ पर हो उजियारा,
हर दिल में हो विश्वास नया।
आओ मिलकर गीत रचें हम,
जीवन बने मधुर गान नया।
उमाकान्त
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