ई-अवशेषों का भी मुक़द्दर बदल सकता है,
टूटे उपकरणों में भी नव अंकुर पल सकता है।
लोहे की नीरव देह में हरित कली मुस्काई,
मौन पड़ी मशीनों में फिर जीवन-धुन समाई।
जहाँ कभी थे तार, सर्किट और धातु के निशान,
आज वहीं महक उठा है हरियाली का वरदान।
ई-अवशेषों ने सिखलाया , कुछ भी नहीं बेकार,
हर अंतिम पड़ाव में छिपा होता नव संसार।
जो कल था परित्यक्त, आज सृजन सँवारता है,
हर जंग लगा कण भी, उम्मीदें सँजोता है।
आओ हम भी देखें हर टूटन में नवप्रभात,
कुछ भी नहीं व्यर्थ जग में, यदि दृष्टि नई हो साथ।
हर ई-अवशेष के अंतर में सोया है नवप्राण,
हर अंत की गोद से जन्मे, जीवन का नव विहान।

Comments
Post a Comment