कचरे का भी
मुक़द्दर बदल सकता है,
टूटी मशीनों में भी
अंकुर पल सकता है।
मुक़द्दर बदल सकता है,
टूटी मशीनों में भी
अंकुर पल सकता है।
लोहे की नीरस देह में
हरी कली मुस्काई,
मृत उपकरण की धड़कन
फिर से गुनगुनाई।
जहाँ था कभी सर्किट,
अब हरियाली है,
ई–कचरे में जीवन की
नई लाली है।
सीखा यह पत्ता,
न कोई चीज़ बेकार,
हर अंत में छुपा है
शुरुआत का उपहार।
जो फेंका गया कल,
आज जीवन रचता है,
हर जंग लगा टुकड़ा भी
उम्मीद बुनता है।
आओ हम भी देखें
हर टूटे में नवप्रभात,
कुछ नहीं है कचरा
बस दृष्टि की बात।
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