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साँसों का कर्ज़ | दर्द, इंसानियत और रिश्तों की संवेदना पर एक भावपूर्ण हिंदी कविता

  साँसों का कर्ज़  दर्द, इंसानियत और रिश्तों की संवेदना पर एक भावपूर्ण हिंदी कविता दर्द किसी का भी हो , दर्द कभी पराया नहीं होता। एक कराह उठे जहाँ कहीं , वहाँ आसमान भी चुप नहीं होता। साँसें तो सबके सीने में , चुपचाप सफ़र करती हैं। पर कुछ साँसें ऐसी होती हैं , जो दूसरों के लिए भी जीती हैं। होंठों की हमदर्दी से ज़ख्म कहाँ भर पाते हैं ? मरहम तो वही बनते हैं , जो अपने हाथ बढ़ाते हैं। खाली दिखावे की धूप में , रिश्तों की फसल नहीं पकती। नेकी की भीगी मिट्टी पर, इंसानियत अंकुरित होती। घड़ियाली आँसू बहाने से , तक़दीर नहीं सँवरती है। बाज़ू चढ़ाकर चल पड़ो तो , राह भी ख़ुद निखरती है। किसी की बुझती साँसों में यदि उम्मीद की लौ भर दो , अपने हिस्से की धूप समेटो , उसके आँगन में बिखेर दो। दीप वही क्या दीप कहाए , जो बस अपने घर में जले ? सूरज बनना हो तो यारो, हर देहरी पर भोर खिले। जीवन का क्या मोल अगर, बस अपनी धड़कन सुनते रहे। जीना तो तब है, जब रिश्तों की धड़कन बन...

मौन की भाषा

खोज में निकला था, बाहर उमाकान्त, शब्दों में सच था, पर मन था शान्त। तर्कों के साए में भटका बहुत, पर सत्य न पाया, रहा बस विभ्रांत। बुद्ध ने कहा, “दीपक स्वयं बनो,” विवेकानंद बोले, “खुद को पहचानो।” कृष्णमूर्ति की वाणी गूंजे कहीं, “जो ज्ञात है, बस भ्रम है यहीं।” सत्य न ग्रंथों में, न शास्त्रों की रीत, न वाद-विवाद, न तर्कों की जीत। यह तो बस मौन की भाषा में बसता, हृदय की गहराइयों में ही हंसता। जो भीतर उतरे, वही जान पाए, जो खुद को समझे, वही सत्य पाए। खोलो यह पर्दा, हटाओ यह धुंध, सत्य वहीं है, जहां हो अनुगंध। उमाकान्त