माँ... खाना खाया क्या? | माँ की ममता पर एक भावुक हिंदी कविता | असंख्य माँओं के जीवन की सच्ची झलक से प्रेरित।
"बेटा, खाना खाया क्या? " यह केवल पाँच शब्द नहीं, एक माँ का अनंत प्रेम है। असंख्य माँओं के जीवन की सच्ची झलक से प्रेरित। बचपन में यह प्रश्न हमें साधारण लगता है। बड़े होकर कभी-कभी यही प्रश्न हमें व्यस्तता जैसा प्रतीत होता है। लेकिन समय का चक्र जब हमें भी माता-पिता बना देता है, तब समझ आता है कि इस छोटे-से प्रश्न में कितनी चिंता, कितनी दुआ, कितना त्याग और कितना निस्वार्थ प्रेम छिपा था। यह कविता किसी एक माँ की नहीं, उन सभी माताओं को समर्पित है जो अपने बच्चों की हर खुशी में अपना संसार ढूँढ़ लेती हैं। शायद इस कविता को पढ़ते-पढ़ते आपको भी अपनी माँ की वही आवाज़ सुनाई दे "बेटा... खाना खाया क्या?" माँ... खाना खाया क्या? कप की खन-खन सुनते ही बस, लगता माँ अब जाग गई, उस मीठी-सी आवाज़ के संग, घर की हर धड़कन जाग गई। धीरे से कमरे में आकर, माँ ने परदा सरकाया, माथे पर फिर हाथ फेरकर, हँसकर मुझको जगाया। "उठो बेटा, अब सुबह हुई, देखो सूरज आया," माँ की मीठी उस आवाज़ ने, हर आलस दूर भगाया। "माँ... थोड़ी देर और सोने दो..." करवट लेकर मैंने बोला, माँ ने मा...