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गणगौर मेला, मेहनत की कमाई और बचपन की मीठी यादें

This post on " Kagaj Ke Patte" presents the same childhood memory " The Gangaur Mela" in two forms, prose and poetry. It recalls the joy of gathering leftover grains, earning my first coins, and celebrating Gangaur Mela, reminding us that the sweetest memories are often born from the simplest moments.   गणगौर मेला -  The Gangaur Mela  खलिहान से जब अनाज उठ जाता था, तब शुरू होता था ‘ सिल्ला बीनने ’ का मौसम। (सिल्ला एक राजस्थानी शब्द है जिसका अर्थ , खलिहान ( where harvested crops are collected, threshed (separated from stalks/husks) में अनाज उठाने के बाद जब कुछ अनाज के दाने खलिहान में पड़े रहा जाते है , वहां से एक एक दाने को बीनने या चुनने की प्रक्रिया को सिल्ला बीनना कहा जाता था।     अनाज उठने के बाद भी ज़मीन में दाने बिखरे रह जाते थे।  उन दानों को एक-एक करके चुनना .. उन्हें अपनी छोटी-सी झोली में भरना . . . यह काम हम बच्चों को मिलता था, जब हम बहुत छोटे थे। एक-एक दाना बीनते बीनते आधा किलो, कभी एक किलो तक अनाज इकट्ठा हो जाता था। उन बीने हुए दानों को बाज़ार में...