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"क्या याद है आपको | बड़े भाई को एक पत्र

 बड़े भाई को एक पत्र | "क्या याद है आपको?"

बचपन की यादों को फिर से जीने का एक आत्मीय प्रयास...


यह कोई काल्पनिक कविता नहीं, बल्कि मेरे बड़े भाई के नाम लिखा गया एक आत्मीय पत्र है। समय के साथ जीवन बदलता गया, जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं, लेकिन गाँव की गलियाँ, बचपन के खेल, खेत-खलिहान, मेले, परिवार का स्नेह और साथ बिताए वे अनमोल पल आज भी स्मृतियों में वैसे ही बसे हुए हैं।

यह पत्र उन्हीं यादों को फिर से जीने, उन्हें शब्दों में संजोने और बड़े भाई के साथ साझा करने का एक छोटा-सा प्रयास है।

क्या याद है आपको!

गाँव की गलियों में पेड़ की डालियों पे,

वो गुलाक कांकड़ी खेली जाती।

वो छुपा-छुपी, वो किलकिल काँटे,

और मृदुल-मृदुल थे कई साथी।

क्या याद है आपको!

सुबह-सुबह वो स्कूल जाना,

बैग में चटनी-रोटी खाना।

मन नहीं होता पढ़ने में,

तो पेट दर्द का वो बहाना।

क्या याद है आपको!

छुट्टी के दिन खेतों पे जाना,

मज़दूरों के संग खेत नड़ाना।

और दोपहर को मेला का हेला,

आँक के पत्तों में राबड़ी का बेला।

क्या याद है आपको!

बाजरा जब कट जाता था,

खलिहान में पहुँच जाता था।

कड़ब से बनती सुंदर कुटिया,

एक गधूली, एक रजाई और पानी की लुटिया।

क्या याद है आपको!

बाजरा बरसाया जाता,

सीधा भुखारी में पहुँच जाता।

और फिर आता सिल्ले का सीज़न,

गणगौर मेले में गब्बे खाने का मन।

क्या याद है आपको!

रोज़-रोज़ नहाने पे लड़ाई,

जीजी की वो प्यारी पिटाई।

लेज़ बाल्टी लेकर कुएँ पर जाना,

पत्थर से वो मैल छुड़ाना।

क्या याद है आपको!

ना मैं भूला हूँ, ना तुम भूलना,

प्यार के फूलों का पलना।

तुम झूलना और झुलाना,

फिर देखो सपना सुहाना।

सप्रेम,

आपका छोटा भाई

उमाकान्त 

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