ई-अवशेषों का पुनर्जन्म ई-अवशेषों का भी मुक़द्दर बदल सकता है, टूटे उपकरणों में भी नव अंकुर पल सकता है। लोहे की नीरव देह में हरित कली मुस्काई, मौन पड़ी मशीनों में फिर जीवन-धुन समाई। जहाँ कभी थे तार, सर्किट और धातु के निशान, आज वहीं महक उठा है हरियाली का वरदान। ई-अवशेषों ने सिखलाया , कुछ भी नहीं बेकार, हर अंतिम पड़ाव में छिपा होता नव संसार। जो कल था परित्यक्त, आज सृजन सँवारता है, हर जंग लगा कण भी, उम्मीदें सँजोता है। आओ हम भी देखें हर टूटन में नवप्रभात, कुछ भी नहीं व्यर्थ जग में, यदि दृष्टि नई हो साथ। हर ई-अवशेष के अंतर में सोया है नवप्राण, हर अंत की गोद से जन्मे, जीवन का नव विहान।
कुछ अल्फ़ाज़ कागज़ पर उतरते हैं, कुछ रिश्तों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। 👇 नीचे स्क्रॉल करें—हर पोस्ट एक नई कहानी, एक नई अनुभूति लेकर आपका इंतज़ार कर रही है। गीत • भजन • ग़ज़ल • कविताएँ • कहानियाँ