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अरमान बहुत हैं मेरे

अरमान बहुत हैं मेरे The poem reflects the aspirations of a soul seeking purpose beyond personal success. It is about transforming life's experiences into wisdom, fulfilling responsibilities, and inspiring others through compassion, service, and hope. अरमान बहुत हैं मेरे, धरातल पे कैसे लाऊँ। जो सपने देखे हैं मैंने, कैसे  उन्हें  सजाऊँ॥ सपनों की ऊँची उड़ानों को, सच की ज़मीं पर लाना है। जो पाया जीवन की राहों में, जन-जन तक पहुँचाना है अहसासों में बसी आहों को, कैसे पार लगाऊँ। अरमान बहुत हैं मेरे, धरातल पे कैसे लाऊँ। ज़िंदगी बहुत छोटी है, करने को कितना बाकी है। हर चेहरे की अपनी पीड़ा, हर आँख में इक झाँकी है। दर्द जग में इतना फैला, किस-किस को पार लगाऊँ। जो सपने देखे हैं मैंने, कैसे उन्हें  सजाऊँ॥ एक तरफ़ है मेरा दफ़्तर, दूजी तरफ़ संसार खड़ा। जाने कितनी आशाओं का, मुझसे हर विश्वास जुड़ा। कुछ ऐसा करके जाना है, जो सबके काम भी आऊँ। अरमान बहुत हैं मेरे, धरातल पे कैसे लाऊँ। कुछ सपने हैं गीतों में मेरे, कुछ कविता की मुस्कान बने। कुछ रेखाओं में भाग्य पढ़ूँ, कुछ जीवन की पहचान बने। ...

साँसों का कर्ज़ | दर्द, इंसानियत और रिश्तों की संवेदना पर एक भावपूर्ण हिंदी कविता

  साँसों का कर्ज़  दर्द, इंसानियत और रिश्तों की संवेदना पर एक भावपूर्ण हिंदी कविता दर्द किसी का भी हो , दर्द कभी पराया नहीं होता। एक कराह उठे जहाँ कहीं , वहाँ आसमान भी चुप नहीं होता। साँसें तो सबके सीने में , चुपचाप सफ़र करती हैं। पर कुछ साँसें ऐसी होती हैं , जो दूसरों के लिए भी जीती हैं। होंठों की हमदर्दी से ज़ख्म कहाँ भर पाते हैं ? मरहम तो वही बनते हैं , जो अपने हाथ बढ़ाते हैं। खाली दिखावे की धूप में , रिश्तों की फसल नहीं पकती। नेकी की भीगी मिट्टी पर, इंसानियत अंकुरित होती। घड़ियाली आँसू बहाने से , तक़दीर नहीं सँवरती है। बाज़ू चढ़ाकर चल पड़ो तो , राह भी ख़ुद निखरती है। किसी की बुझती साँसों में यदि उम्मीद की लौ भर दो , अपने हिस्से की धूप समेटो , उसके आँगन में बिखेर दो। दीप वही क्या दीप कहाए , जो बस अपने घर में जले ? सूरज बनना हो तो यारो, हर देहरी पर भोर खिले। जीवन का क्या मोल अगर, बस अपनी धड़कन सुनते रहे। जीना तो तब है, जब रिश्तों की धड़कन बन...

मौन की भाषा

खोज में निकला था, बाहर उमाकान्त, शब्दों में सच था, पर मन था शान्त। तर्कों के साए में भटका बहुत, पर सत्य न पाया, रहा बस विभ्रांत। बुद्ध ने कहा, “दीपक स्वयं बनो,” विवेकानंद बोले, “खुद को पहचानो।” कृष्णमूर्ति की वाणी गूंजे कहीं, “जो ज्ञात है, बस भ्रम है यहीं।” सत्य न ग्रंथों में, न शास्त्रों की रीत, न वाद-विवाद, न तर्कों की जीत। यह तो बस मौन की भाषा में बसता, हृदय की गहराइयों में ही हंसता। जो भीतर उतरे, वही जान पाए, जो खुद को समझे, वही सत्य पाए। खोलो यह पर्दा, हटाओ यह धुंध, सत्य वहीं है, जहां हो अनुगंध। उमाकान्त

कविता क्यों ? | क्यों जन्म लेती है कविता? एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति

भावनाओं के भंवर में, जब फँसा हो कोई, 'और' मौसम भी बेअसर होता है ।   सूझता नही, कुछ भी बस, नये शब्दों से सरोकार उसका होता है I   दो लाईन गर लिख भी दी कुछ और नहीं,   कविता का रूप ही होता है I