अरमान बहुत हैं मेरे
The poem reflects the aspirations of a soul seeking purpose beyond personal success. It is about transforming life's experiences into wisdom, fulfilling responsibilities, and inspiring others through compassion, service, and hope.
धरातल पे कैसे लाऊँ।
जो सपने देखे हैं मैंने,
कैसे उन्हें सजाऊँ॥
सपनों की ऊँची उड़ानों को,
सच की ज़मीं पर लाना है।
जो पाया जीवन की राहों में,
जन-जन तक पहुँचाना है
अहसासों में बसी आहों को,
कैसे पार लगाऊँ।
अरमान बहुत हैं मेरे,
धरातल पे कैसे लाऊँ।
ज़िंदगी बहुत छोटी है,
करने को कितना बाकी है।
हर चेहरे की अपनी पीड़ा,
हर आँख में इक झाँकी है।
दर्द जग में इतना फैला,
किस-किस को पार लगाऊँ।
जो सपने देखे हैं मैंने,
कैसे उन्हें सजाऊँ॥
एक तरफ़ है मेरा दफ़्तर,
दूजी तरफ़ संसार खड़ा।
जाने कितनी आशाओं का,
मुझसे हर विश्वास जुड़ा।
कुछ ऐसा करके जाना है,
जो सबके काम भी आऊँ।
अरमान बहुत हैं मेरे,
धरातल पे कैसे लाऊँ।
कुछ सपने हैं गीतों में मेरे,
कुछ कविता की मुस्कान बने।
कुछ रेखाओं में भाग्य पढ़ूँ,
कुछ जीवन की पहचान बने।
जो भी पाया प्रभु की कृपा से,
सबमें उसको बाँटता जाऊँ।
अरमान बहुत हैं मेरे,
धरातल पे कैसे लाऊँ॥
मंज़िल कोई दूर नहीं है,
बस हिम्मत कम होने न दूँ।
थककर चाहे रुक भी जाऊँ,
मन को कभी मैं रोने न दूँ।
छोटा-सा दीपक बनकर भी,
अँधियारों को दूर भगाऊँ।
अरमान बहुत हैं मेरे,
धरातल पे कैसे लाऊँ।
जीवन केवल अपना नहीं है,
सबसे इसका नाता है।
जिस दिन कोई मुस्कान मिले,
जीवन सफल हो जाता है।
जब तक साँसें साथ निभाएँ,
प्रेम के दीप जलाता जाऊँ।
अरमान बहुत हैं मेरे,
धरातल पे कैसे लाऊँ।
© 2026 उमाकांत वशिष्ठ
कागज़ के पत्ते | रिश्तों के फूल
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बहुत खूबसूरत भाव अभिव्यक्ति
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