पूजा बत्ती करली मैंने मंदिर भोग लगा आया, लोगों को मन्तर आता नहीं मैंने तो मन्तर भी गाया कर दान रुपे दो मंदिर में, मैं दानवीर भी कहलाया। दोष दिखें औरों में मुझको , मेरी तो निर्दोषी काया , नही क्रोध मुझ में थोड़ा भी , पर औरों पे गुस्सा आया , अहम नही मुझ में बोलो मैंने तो मैं को ही पाया ज्ञान बहुत मुझ में मगर औरो में भूसा देखा अहम के जंजाल में फंस, खींची मैंने रेखा पे रेखा
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