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आओ मिलकर गीत रचें

आओ मिलकर गीत रचें ग़ज़ल ढली रात, फिर सवेरा भी निकल रहा है, हर एक ज़ख्म चुपके से अब सँभल रहा है। ग़मों के समंदर चाहे बहुत गहरे रहे, उम्मीद का हर इक साहिल बदल रहा है। कुछ लोग बिछड़ गए तो ये गिला भी नहीं, उनकी दुआ का दीपक अभी भी जल रहा है। न शिकवा किसी से है, न किसी बात का मलाल, वक़्त अपने ढंग से सब कुछ बदल रहा है। चलो कि फिर नई राह कोई तलाश करें, हर एक मोड़ पर मंज़िल का दिल मचल रहा है। जो गिर के फिर उठा, वही मुसाफ़िर कहलाया, हर एक ठोकर से इंसाँ सँभल रहा है। आओ मिलकर गीत रचें, दिल से दिल मिलाएँ, हर एक सुर में नया हौसला पनप रहा है। 'उमाकांत' हौसला मत कभी हारना तुम, तुम्हारे साथ हर पल ये कारवाँ चल रहा है। उमाकान्त

तुझे क्या खबर

  तुझे क्या ख़बर… तुझे क्या ख़बर, तुझसे कितना प्यार करता हूँ, हर एहसास छुपाकर, दिल में तेरा घर रखता हूँ। तुझे क्या ख़बर… तुझे क्या ख़बर… जज़्बातों को लफ़्ज़ों में ढालूँ कैसे, हर अल्फ़ाज़ तेरा आईना लगता है। जो बात लबों तक आ न सकी, वो ख़ामोशियों में भी सुनाई देती है। तुझे क्या ख़बर… अगर पढ़ सके तो पढ़ लेना, मेरी आँखों की हर तहरीर। मौन रहकर भी हर पल, तेरी धड़कनों से करता हूँ तक़रीर। तुझे क्या ख़बर… हर लम्हा तेरी याद में यूँ ढलता है, जैसे चाँद रात की बाँहों में पिघलता है। तू दूर होकर भी मुझसे दूर कहाँ, हर साँस में तेरा ही एहसास पलता है। तुझे क्या ख़बर… तू अहसास है मेरी हर दुआ का, तू सुकून है मेरी हर बेचैनी का। तेरे बिना भी जी तो लेता हूँ मगर, क्या नाम दूँ इस अधूरी ज़िंदगी का। तुझे क्या ख़बर… न कोई शिकवा, न कोई गिला, बस तेरा इंतज़ार मुकद्दर है। तू मिले या न मिले इस सफ़र में, तुझसे मोहब्बत ही मेरी मंज़िल है। तुझे क्या ख़बर… तू ही नूर है, तू ही सुकून मेरा, तुझसे ही मेरी हर सुबह, हर शाम। मैं ख़ुद को भूल भी जाऊँ अगर कभी, दिल फिर भी लेता है तेरा ही नाम। तुझे क्या ख़बर, तुझको मैं कितना, अपनी ...