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आओ मिलकर गीत रचें

आओ मिलकर गीत रचें
ग़ज़ल


ढली रात, फिर सवेरा भी निकल रहा है,
हर एक ज़ख्म चुपके से अब सँभल रहा है।
ग़मों के समंदर चाहे बहुत गहरे रहे,
उम्मीद का हर इक साहिल बदल रहा है।
कुछ लोग बिछड़ गए तो ये गिला भी नहीं,
उनकी दुआ का दीपक अभी भी जल रहा है।
न शिकवा किसी से है, न किसी बात का मलाल,
वक़्त अपने ढंग से सब कुछ बदल रहा है।
चलो कि फिर नई राह कोई तलाश करें,
हर एक मोड़ पर मंज़िल का दिल मचल रहा है।
जो गिर के फिर उठा, वही मुसाफ़िर कहलाया,
हर एक ठोकर से इंसाँ सँभल रहा है।
आओ मिलकर गीत रचें, दिल से दिल मिलाएँ,
हर एक सुर में नया हौसला पनप रहा है।
'उमाकांत' हौसला मत कभी हारना तुम,
तुम्हारे साथ हर पल ये कारवाँ चल रहा है।
उमाकान्त

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