दोस्त दिल के दरवाजे से आते हैं, मोहब्बत की रौशनी जगाते हैं।
दौलत से खरीदे जहां के सभी साजो-सामान, मगर दिल की दौलत से ही, दिलों के दर खुलते हैं।
दिल की चौखट पर जब दोस्त आते हैं,
मोहब्बत के दीप वहां जलाते हैं।
हर कोना रौशन हो उठता है फिर,
जब मुस्कान से जज़्बात सजाते हैं।
सोने-चांदी से सजे हैं कई मकान,
पर उनमें नहीं वो अपनापन का गान।
जो दिल से मिले, वो दिल में बस जाए,
वो दौलत नहीं, जो हर दिल को भाए।
सजाएं महल या खरीदें ज़मीन,
बिन सच्चे जज़्बे, सब बातें अधीन।
दिल की दौलत हो, तो रिश्ते भी खिलते हैं,
वरना ताले तो दरवाज़ों पर भी मिलते हैं।
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