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Showing posts from 2025

दसवीं कक्षा

 कक्षा दस है मोड़ ज़िंदगी का, शुरुआत यहाँ से उड़ान की, मेहनत का रस पी जो ले, खुल जाएं राहें सम्मान की। ग्यारह–बारह बस दो कदम हैं, जो तय करें भविष्य की राह, पढ़ना समझना गहराई से, यही सफलता का है गवाह। सवालों से मत डर बेटा, हर प्रश्न है एक साथी तेरा, जो हल करेगा धैर्य रख, जीत लेगा संसार सारा। समय को जो देता सम्मान, वो पाता है ऊँचा स्थान, जो ध्यान भटकाए मन का दीप, उसे मिलता संघर्ष का दान। इसलिए अभी से ठान ले दिल में, "हर दिन कुछ बेहतर करना है", ज्ञान की ज्योति जलाकर खुद में, भविष्य अपना गढ़ना है।

कचरे का भी मुक़द्दर

  कचरे का भी  मुक़द्दर बदल सकता है, टूटी मशीनों में भी  अंकुर पल सकता है। लोहे की नीरस देह में  हरी कली मुस्काई, मृत उपकरण की धड़कन  फिर से गुनगुनाई। जहाँ था कभी सर्किट,  अब हरियाली है, ई–कचरे में जीवन की  नई लाली है। सीखा यह पत्ता,  न कोई चीज़ बेकार, हर अंत में छुपा है  शुरुआत का उपहार। जो फेंका गया कल,  आज जीवन रचता है, हर जंग लगा टुकड़ा भी  उम्मीद बुनता है। आओ हम भी देखें  हर टूटे में नवप्रभात, कुछ नहीं है कचरा बस दृष्टि की बात।

चल अकेला

  आया था बिल्कुल अकेला, ना कोई अपना, ना कोई मेला। फिर अनगिन रिश्तों की डोर जुड़ गई, जीवन की राह संग-संग मुड़ गई। संबंधों ने हर दर्द संभाला, रिश्तों से हर क़दम था निराला। कुछ दोस्त, कुछ रिश्ते टूट गए, बिखरे पत्तों से सपने छूट गए। फिर भी समय हर घड़ी पुकारे, यादों के दीपक मन में सँवारे। दुःख भी उनमें, सुख भी वही, जीवन का सार छुपा है यहीं। राह सुनसान, चल अकेला, साथ मिले,  तो प्रभु का मेला। कर्म किए जा, मत होना ढीला, संग प्रभु के,  कटे हर पीड़ा और झमेला। उमाकान्त

अब ससुराल संवारना

 दोहा :  बिटिया सुख की छाँव है, बिटिया जीवन प्राण आज समर्पण कर रहे,  करके कन्यादान गीत ओ समधी जी......ओ समधन जी ..... हम पर इक,         उपकार करो । बड़ा कठिन है, ये क्षण जीवन का ,  दिल से दिल का,         दान करो ।। बिटिया हमारी लाडली , सबके आँखों की ज्योति है।   हर सुख-दुःख में संग खड़ी,  ममता की महक निराली है।।      घर आँगन की किलकारी, हर दुःख की मुस्कान बनी।    पापा के  साँसों की धड़कन,  माँ के मन की प्रीति बनी।।   ओ समधी जी......ओ समधन जी ..... जब मिल जाये शगुन हो जाये , हर घर में खुशियां भर जाये।   नए काम की शुरुआत में,          स्वयं खड़ी महूरत बन जाये।।    आज सजी है दुल्हन बन के,      नयन नीर से भरे हुए ।   तेरे सपनों का हर उजियारा, अब नए आंगन सँवारे हुए ।।   ओ समधी जी......ओ समधन जी ..... जग की रीत पुरानी है ये,        अब ससुराल सँवारना । हर रिश्ता अपना...

माँ-बाप का जीवन, त्याग की कहानी

 प्रेम का असली अर्थ माँ-बाप का जीवन, त्याग की कहानी, हर सुख-स्वप्न छोड़े, बस बच्चों की रवानी। हर चाहत भूले, अपना सब कुछ खोया, उनके लिए हर दिन, हर सपना संजोया। प्रेम ना है आशा, ना कोई अधिकार, ये बस है देना, निस्वार्थ अपार। आभार और समझ जब रिश्तों में आए, सुख-शांति के दीपक जीवन में जगमगाए। बच्चे समझें हक़, बस लेते ही जाएँ, पर कर्म से रिश्ते की गहराई बढ़ाएँ। ऋण ये नहीं, है ईश्वर का वरदान, सम्मान ही इसका है सच्चा प्रमाण। माता-पिता भी समझें ये सदा, हर वक्त साथ रहना नहीं है वादा। अपेक्षा हो सीमित, विश्वास रहे साथ, यही है रिश्तों की सच्ची परिभाषा। प्रेम ना है आशा, ना कोई अधिकार, ये बस है देना, निस्वार्थ अपार। आभार और समझ जब रिश्तों में आए, सुख-शांति के दीपक जीवन में जगमगाए। निःस्वार्थ और प्रेम हैं गहरे राज़, आत्मचिंतन से खुलते इनके अंदाज़। आशा-अधिकार की बाँधो सीमा, तभी निखरेगी जीवन की गरिमा। उमाकान्त

आओ चलो बातें करें

  आओ चलो बातें करें 🤔😊😂👌😍  बात ही है , जो बाती बनकर लौ जलाए,  बात वही, जो बातों बोतों में बवाल मचाए।  बात ही है, जो ढाढ़स बनकर मन सहलाए,  बात वही, जो सूत्र बनकर प्रसून खिला जाए।   उमाकान्त

काश... मेरी माँ आज भी होती,

 काश... मेरी माँ आज भी होती काश... मेरी माँ आज भी होती, अपनी पोती की शादी में मोह से भीगती। कभी उसे सँवारती, कभी दुल्हन-सी सजाती, कभी भीगी पलकों से मुस्कराती, कभी नजरें फेर इठलाती। जयेश को देख हौले से मुस्काती, चुपके से उसका माथा चूम दुलराती, 'ख्याल रखना मेरी बच्ची का'  धीमे से कानों में ये प्यार भरी सीख सुनाती। काश... मेरी माँ होती, तो मैं भी थक कर उसके आँचल में सिमट जाता, भीड़-भाड़ से बचकर उसके सीने से लग जाता। जब जिम्मेदारियाँ बोझ बनतीं, वो एक चुम्बन से सब हल्का कर देती। हर रस्म में उसकी आँखों की चमक कुछ और होती, फेरे देख उसकी पलकें भीग-सी जातीं। वो कहती, 'कमियाँ नहीं, दुआएँ देना', हर अनहोनी को अपने आशीर्वादों से ढँक लेती। कोई उसकी मौजूदगी में ऊँचा स्वर न उठाता, और वह, हर चूक को हँसते-हँसते माफ कर जाती। विदाई की घड़ी में, वो मुझे कसकर थाम लेती, मेरी बहती आँखों को अपने आँचल से चुपके से पोंछ लेती। काश... मेरी माँ होती, तो मैं यूँ चुपचाप न रोता, उसकी बाहों में अपने सपनों को सहेज लेता। आज जब मेरी बेटी डोली में बैठेगी, मेरा दिल चुपके से उसकी ममता को खोजेगा। काश... मेरी मा...

आओ मिलकर गीत रचें

 ढली रात, फिर सवेरा हुआ, काली घटाएँ छँटने लगीं। ग़म के सागर गहरे सही, पर खुशियाँ भी फिर उछलेंगी। कुछ साथी छूटे राहों में, पर यादें उनकी मुस्काएँगी। उनकी सीख, उनके अफ़साने, ज़िंदगी को फिर रंग लाएँगी। चलो नया कोई रस्ता खोजें, बैठें मिलकर, साथ में चलें। जीवन के रंग बिखरें ऐसे, जैसे बहारें हर सू खिलें। हर मोड़ पर हो उजियारा, हर दिल में हो विश्वास नया। आओ मिलकर गीत रचें हम, जीवन बने मधुर गान नया। उमाकान्त

मौन की भाषा

खोज में निकला था, बाहर उमाकान्त, शब्दों में सच था, पर मन था शान्त। तर्कों के साए में भटका बहुत, पर सत्य न पाया, रहा बस विभ्रांत। बुद्ध ने कहा, “दीपक स्वयं बनो,” विवेकानंद बोले, “खुद को पहचानो।” कृष्णमूर्ति की वाणी गूंजे कहीं, “जो ज्ञात है, बस भ्रम है यहीं।” सत्य न ग्रंथों में, न शास्त्रों की रीत, न वाद-विवाद, न तर्कों की जीत। यह तो बस मौन की भाषा में बसता, हृदय की गहराइयों में ही हंसता। जो भीतर उतरे, वही जान पाए, जो खुद को समझे, वही सत्य पाए। खोलो यह पर्दा, हटाओ यह धुंध, सत्य वहीं है, जहां हो अनुगंध। उमाकान्त

छोटी सी गुड़िया

 छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई।  कल ही तो गोद में थी,  हंसती गाती फूलों सी कोमल कली आज निडर हो गई छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई।  पलक झपकते ही ऋतुऐं कितनी बदल गई कल की नन्ही नन्ही बातें आज कहानी हो गई छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई।  मेरे सपनों की परी आज आसमान छूने को है नन्हा सा पंछी अब उड़ान भरने को है अभी तो सुबह थी कब सांझ हो गई छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई।  याद है वह दिन नन्हे हाथों से मेरी उंगली थामी थी  दो कदम क्या चली, सुंदर सी चप्पल खरीदी थी  आज मेरी आरजू उसकी हो गई छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई। उमाकान्त