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खुदकश

 

 

आदमी पास होकर भी

दूर हो जाता है I

दूर रहकर

पास आने के लिए तरसता है I

 

अजीब सी दुनिया है

तेरी भगवान्

“खुदकश”

खुद को ही खुद से

दूर करता है I

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खींची मैंने रेखा पे रेखा

 पूजा बत्ती करली मैंने  मंदिर भोग लगा आया, लोगों को मन्तर आता नहीं मैंने तो मन्तर भी गाया  कर दान रुपे दो मंदिर में, मैं दानवीर भी कहलाया। दोष दिखें  औरों में मुझको , मेरी तो निर्दोषी काया ,  नही क्रोध मुझ में थोड़ा भी , पर औरों पे गुस्सा आया , अहम नही मुझ में बोलो मैंने तो मैं को ही पाया ज्ञान बहुत मुझ में मगर औरो में भूसा देखा अहम के जंजाल में फंस, खींची मैंने रेखा पे रेखा

अब ससुराल संवारना

 दोहा :  बिटिया सुख की छाँव है, बिटिया जीवन प्राण आज समर्पण कर रहे,  करके कन्यादान गीत ओ समधी जी......ओ समधन जी ..... हम पर इक,         उपकार करो । बड़ा कठिन है, ये क्षण जीवन का ,  दिल से दिल का,         दान करो ।। बिटिया हमारी लाडली , सबके आँखों की ज्योति है।   हर सुख-दुःख में संग खड़ी,  ममता की महक निराली है।।      घर आँगन की किलकारी, हर दुःख की मुस्कान बनी।    पापा के  साँसों की धड़कन,  माँ के मन की प्रीति बनी।।   ओ समधी जी......ओ समधन जी ..... जब मिल जाये शगुन हो जाये , हर घर में खुशियां भर जाये।   नए काम की शुरुआत में,          स्वयं खड़ी महूरत बन जाये।।    आज सजी है दुल्हन बन के,      नयन नीर से भरे हुए ।   तेरे सपनों का हर उजियारा, अब नए आंगन सँवारे हुए ।।   ओ समधी जी......ओ समधन जी ..... जग की रीत पुरानी है ये,        अब ससुराल सँवारना । हर रिश्ता अपना...

मौन की भाषा

खोज में निकला था, बाहर उमाकान्त, शब्दों में सच था, पर मन था शान्त। तर्कों के साए में भटका बहुत, पर सत्य न पाया, रहा बस विभ्रांत। बुद्ध ने कहा, “दीपक स्वयं बनो,” विवेकानंद बोले, “खुद को पहचानो।” कृष्णमूर्ति की वाणी गूंजे कहीं, “जो ज्ञात है, बस भ्रम है यहीं।” सत्य न ग्रंथों में, न शास्त्रों की रीत, न वाद-विवाद, न तर्कों की जीत। यह तो बस मौन की भाषा में बसता, हृदय की गहराइयों में ही हंसता। जो भीतर उतरे, वही जान पाए, जो खुद को समझे, वही सत्य पाए। खोलो यह पर्दा, हटाओ यह धुंध, सत्य वहीं है, जहां हो अनुगंध। उमाकान्त