This post on "Kagaj Ke Patte" presents the same childhood memory "The Gangaur Mela" in two forms, prose and poetry. It recalls the joy of gathering leftover grains, earning my first coins, and celebrating Gangaur Mela, reminding us that the sweetest memories are often born from the simplest moments.
गणगौर मेला - The Gangaur Mela
खलिहान से जब अनाज उठ जाता था, तब शुरू होता था ‘सिल्ला बीनने’ का मौसम। (सिल्ला एक राजस्थानी शब्द है जिसका अर्थ , खलिहान ( where harvested crops are collected, threshed (separated from stalks/husks) में अनाज उठाने के बाद जब कुछ अनाज के दाने खलिहान में पड़े रहा जाते है , वहां से एक एक दाने को बीनने या चुनने की प्रक्रिया को सिल्ला बीनना कहा जाता था।
एक-एक दाना बीनते बीनते आधा किलो, कभी एक किलो तक अनाज इकट्ठा हो जाता था।
उन बीने हुए दानों को बाज़ार में बेचने के बजाय हमारी माँ, जिन्हें मैं प्यार से जीजी कहता था, हमसे ही खरीदती थीं। और बदले में हमें कुछ पैसे देती थीं… शायद बाज़ार भाव से भी थोड़ा ज़्यादा।
उन पैसों पर हमारा पूरा अधिकार होता था। मैं उन्हें रोज़ अलग-अलग जगह छिपाकर रखता था, ताकि कोई ढूँढ न सके।
और फिर… हम इंतज़ार करते थे गणगौर के मेले का।
यह काम हमारे लिए जितना रोमांचक था, उतना ही शिक्षाप्रद भी।
एक-एक दाने की कीमत समझ आती थी…कड़ी मेहनत के बाद पैसे कैसे मिलते हैं, यह अहसास होता था…और यह भी कि इस दुनिया में कुछ भी व्यर्थ नहीं, हर चीज़ का अपना मूल्य है।
मुंडिया के पास एक छोटा-सा गाँव था, सालिमपुर। बस बीच में एक नदी का फासला था।
इस मौसम में नदी का पानी कम होता था, इसलिए उसे पार करना मुश्किल नहीं होता था। बड़ों के लिए पानी घुटनों से ऊपर होता, पर हम बच्चे तो अपने कपड़े समेटकर ही उसे पार कर लेते थे।
नदी पार कर हम सालिमपुर के गणगौर मेले में पहुँचते। उस समय वह मेला हमें दुनिया का सबसे बड़ा मेला लगता था छोटी-छोटी दुकानें सजी होती थीं…
पुरुष कुर्ता-धोती और पगड़ी में… औरतें लाल चुनरी, साड़ी या लहंगा-चुन्नी में…
कहीं जुलूस, कहीं नृत्य… हर ओर उत्सव का रंग।
हमारा सबसे बड़ा आकर्षण होता था . .वो दुकानें, जहाँ गब्बे सजे होते थे…या जहाँ स्टील के झुनझुने बिकते थे।
गब्बे यानि खील और गुड़ से बने बड़े-बड़े लड्डू। इतने बड़े कि छोटे हाथों से उन्हें पकड़ने के लिए दोनों हाथ लगाने पड़ते थे।
उस समय हमें लगता था, हमसे बड़ा धनवान कोई नहीं! क्योंकि हमारी जेब में वो पैसे होते थे, जो हमने अपनी मेहनत से कमाए थे… और जिन्हें खर्च करने का पूरा अधिकार भी हमारा ही था।
मुझे आज भी याद है एक बार मैंने मेले से एक बहुत बड़ा गब्बा खरीदा था।
उसे वहीं नहीं खाया…
हाथ में लेकर नदी पार की, घर पहुँचा…और फिर घर की छत पर खड़े होकर, रास्ते की ओर मुँह करके, लोगों को दिखाते हुए, घंटों उसका आनंद लिया।
एक हाथ में झुनझुना…दूसरे में गब्बा…झुनझुना बजाते-बजाते, मैंने वह लड्डू खाया।
उसकी मिठास आज भी मेरे मन में वैसी ही बसी हुई है। आज भी अगर कोई मुझे गब्बा लाकर दे, तो मैं बता सकता हूँ, उसमें वही मिठास है या नहीं…जो उस गणगौर के मेले के गब्बे में थी।
मुक्तछंद काव्य - गणगौर मेला और मीठे-मीठे गब्बे
खलिहान सूना हो जाता था,
पर कहानी वहीं से शुरू होती थी,
जब दानों की खोज में
हमारी छोटी-छोटी हथेलियाँ
धरती से रिश्ता जोड़ती थीं।
एक-एक दाना चुनते-चुनते,
झोली भर जाती थी चुपके से,
आधा किलो, कभी एक किलो
मेहनत का हिसाब
हम खुद ही लिखते थे मन में।
मैं माँ की मुस्कान में
मोल भी था, ममता भी,
वो दाने खरीद लेती थीं हमसे
और दे देती थीं कुछ सिक्के,
शायद बाज़ार से भी ज़्यादा कीमत पर।
वो सिक्के…
हमारी सबसे बड़ी दौलत थे,
जिन्हें हम छुपा-छुपाकर रखते,
और इंतज़ार करते
गणगौर के मेले का।
नदी बीच में थी,
पर हौसले उससे भी गहरे,
घुटनों तक पानी में
हँसते-हँसते पार करते,
सपनों के उस गाँव सालिमपुर तक।
वहाँ रंग ही रंग थे,
कुर्ता, पगड़ी, लाल चुनरियाँ,
नाचते गीत, चलते जुलूस—
जैसे पूरा संसार
एक दिन में सिमट आया हो।
और हम…
दौड़ते थे उस दुकान की ओर,
जहाँ सजे होते थे गब्बे
खील और गुड़ के वो बड़े लड्डू,
जिन्हें पकड़ने को
दोनों हाथ भी छोटे पड़ जाते थे।
उस दिन हम सबसे अमीर होते थे,
क्योंकि जेब में
मेहनत की कमाई होती थी,
और दिल में
खर्च करने की आज़ादी।
याद है मुझे
एक गब्बा लिया था मैंने,
नदी पार की, घर पहुँचा,
छत पर खड़ा होकर
दुनिया को दिखाया उसे,
और धीरे-धीरे
उसकी मिठास जी भर कर जी।
एक हाथ में झुनझुना,
दूसरे में वो लड्डू,
और हर कौर के साथ
बचपन मुस्कुराता रहा।
आज भी वही मिठास
मन में घुली हुई है
कोई लाकर दे अगर गब्बा,
तो पूछूँगा मैं
क्या इसमें वही स्वाद है
मेरे गणगौर के मेले वाला?
21.03.2026
Umakant (shashi)
बहुत उम्दा लेखन
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