माँ... खाना खाया क्या? | माँ की ममता पर एक भावुक हिंदी कविता | असंख्य माँओं के जीवन की सच्ची झलक से प्रेरित।
"बेटा, खाना खाया क्या?" यह केवल पाँच शब्द नहीं, एक माँ का अनंत प्रेम है। असंख्य माँओं के जीवन की सच्ची झलक से प्रेरित।
माँ... खाना खाया क्या?
कप की खन-खन सुनते ही बस, लगता माँ अब जाग गई,
उस मीठी-सी आवाज़ के संग, घर की हर धड़कन जाग गई।
धीरे से कमरे में आकर, माँ ने परदा सरकाया,
माथे पर फिर हाथ फेरकर, हँसकर मुझको जगाया।
"उठो बेटा, अब सुबह हुई, देखो सूरज आया,"
माँ की मीठी उस आवाज़ ने, हर आलस दूर भगाया।
"माँ... थोड़ी देर और सोने दो..." करवट लेकर मैंने बोला,
माँ ने माथा प्यार से चूमा, हाथों से चेहरा सहलाया।
बोली—"उठ जा मेरे बेटे, देख, सवेरा हो आया,"
माँ की प्यारी उस आवाज़ ने, नींद का जादू तोड़ भगाया।
नाश्ता गरम, टिफ़िन भी तैयार, सब कुछ पहले रख देती,
मेरी छोटी-बड़ी ज़रूरत, बिन बोले ही समझ लेती।
"जल्दी करना, देर न करना..." इतना ही दोहराती थी,
मुझको जाते देख हमेशा, चुपचाप हाथ हिलाती थी।
दिन बीते, फिर साल भी बीते, कितने मौसम बीत गए,
माँ की उँगली थामे चलने वाले, कदम अपने ही सीख गए।
कभी जूतों के फीते बाँधे, कभी बस्ता खुद टाँग दिया,
रूठ गया जब छोटी बातों पर, माँ ने हँसकर मान लिया।
बारिश हो या कड़ी धूप हो, माँ हर पल साथ निभाती थी,
मेरी छोटी-सी हर मुश्किल को, अपनी कहकर सुलझाती थी।
गृहस्थी और जिम्मेदारियाँ
शहनाइयों की गूँज के संग, नई दुल्हन उस घर में आई,
माँ ने बढ़कर गले लगाया, हँसकर अपनी बेटी बनाई।
हँसी-खुशी से बीते दिन फिर, घर-आँगन मुस्काने लगा,
नई उम्मीदों, नए सपनों से, हर कोना सजने लगा।
अनकही दूरियाँ और उपेक्षा
घर तो वही था, लोग वही थे, फिर भी मौसम बदल गया,
सीधी-सीधी माँ-बेटे की, बातों में कुछ विराम हुआ।
माँ को जब कुछ कहना होता, पहले बहू से बात हुई,
कुछ बातें बेटे तक पहुँचीं, कुछ मन में ही रह गईं।
मन की बातें मन में रखकर, माँ बस चुप मुस्काती थी,
कहते-कहते होंठ ठहरते, आँखें सब कुछ कह जाती थीं।
माँ ने बस इतना पूछा ... "बेटा... खाना खाया क्या?",
उसने सुनकर भी बस सुन लिया, उत्तर देना भूल गया।
जल्दी-जल्दी घर से निकला, माँ का प्रश्न वहीं रह गया,
एक दिन माँ ने बड़े चाव से, पसंद का खाना बनाया।
सोचा, आज तो साथ बैठकर, कुछ पल साथ बिताया,
बेटा बोला—"माँ, आज तो हम, बाहर खाना खाकर आए।
तुम खा लेना..." इतना कहकर, माँ की आँखें पढ़ न पाए,
थाली चुपचाप ढँक दी माँ ने, चेहरे पर मुस्कान रही।
चूल्हा ठंडा पड़ता देखा, पर उम्मीद गर्म बनी रही,
बाज़ार में कुछ याद जो आया, माँ वह घर ले आई थी।
बोली—"देखो, तेरे लिए है..." आँखों में चमक समाई थी,
बेटा बोला—"माँ, क्यों लाई? घर में सब कुछ पहले से है।"
माँ ने मन ही मन ये समझा, वक़्त, अब कहाँ पहले-सा है,
जिसे सहेजकर घर लाई थी, वह कोने में रख आया मन।
चीज़ नहीं थी, ममता थी वह, कौन समझता उसका धन,
माँ ने फिर कुछ लाना छोड़ा, बस दुआएँ देती जाती।
मन की गठरी बाँध के अपने, चुपचाप ही मुस्काती जाती,
अपने छोटे-छोटे खर्चों को, माँ अक्सर टाल दिया करती।
"बेटे पर बोझ न बन जाऊँ", मन ही मन यह सोचती रहती,
टूटा चश्मा, पुरानी चप्पल, फिर भी काम चला लेती।
अपनी हर छोटी ज़रूरत को, कल पर ही टाल देती,
कई बार मन की बातें लेकर, माँ कमरे तक आ जाती।
बेटा मोबाइल में उलझा होता, फिर चुपचाप लौट जाती,
सोचती—"शाम को कह दूँगी..." शाम भी फिर निकल जाती।
मन की बातें मन में रखकर, माँ फिर चुप रह जाती,
हल्का-हल्का दर्द था दिल में, फिर भी कुछ न कह पाई।
बेटा दफ़्तर की जल्दी में था, माँ ने बात छिपाई,
बोली—"सब ठीक है बेटा..." हँसकर उसको भेज दिया,
अपनी पीड़ा से ज़्यादा उसने, बेटे का दिन सोच लिया।
अहसास का क्षण
समय चला अपनी ही गति से, दिन बीते, बरस गुजर गए,
जो बेटा कल तक बेटा था, उसके भी अब बच्चे हुए।
समय की धारा बहती-बहती, एक नया अध्याय बना,
कल तक जो था माँ का बेटा, आज वही फिर पिता बना।
रात-रात भर जाग-जागकर, नन्हे सपनों को सहलाया,
अपनी नींदें भूल गया वह, बस बच्चे को ही सुलाया।
सुबह अधूरी नींद लिए भी, हँसकर काम निभाता था,
थककर जब घर वापस आता, बच्चों संग मुस्काता था।
अपने हिस्से की कितनी खुशियाँ, बिन बोले ही टाल गया,
अपने सारे छोटे सपने, बच्चों के ही नाम किया।
तब जाकर मन धीरे बोला, यादों का दर खुलने लगा,
"माँ क्यों हरदम पूछती थी..." उत्तर खुद ही मिलने लगा।
एक सुबह फिर वही जुबाँ पर, "बेटा... खाना खाया क्या?",
अपने ही शब्दों की गूँज में, माँ का चेहरा याद आया।
पश्चाताप, मिलन और पूर्णता
कदम स्वयं ही मुड़ते-मुड़ते, माँ के आँगन जा पहुँचे,
चुपके से सिर गोदी में रखकर, बरसों के सब बंधन टूटे।
माँ ने माथा सहलाते पूछा .."बेटा... खाना खाया क्या?",
बस इतना सुनते ही जैसे, सारा बचपन लौट आया।
बेटा माँ से लिपटकर रोया, शब्द कहीं खो से गए,
"माँ... तेरे इन चार शब्दों में, जीवन भर के अर्थ मिले।
जिसे समझा था रोज़ का प्रश्न, वह ममता का संसार था,
'खाना खाया?' के पीछे छिपा, माँ का पूरा प्यार था।
अब समझा हूँ प्रेम की भाषा, जिसमें ना कोई अधिकार,
अपने हिस्से की खुशियाँ देकर, भर देती दूजे का संसार।
माँ के "खाना खाया क्या?" में, ममता का विस्तार मिला,
एक ही छोटे-से प्रश्न में ही, मुझको जग का प्यार मिला।
जिस घर में यह प्रश्न गूँजे, वहाँ प्रेम कभी मरता नहीं,
माँ की दुआएँ साथ हों जिसके, वो जीवन में कभी हारता नहीं।
उस निष्छल-सी एक पुकार में, सुख-दुख का सारा सार छिपा,
माँ के उस हर एक प्रश्न में, ईश्वर का आशीर्वाद छिपा।
माँ ममता की मूरत है
ReplyDeleteएक खूबसूरत एहसास ..
Thank you so much, Bhai Sahab! 🙏
DeleteYour kind words and encouragement truly motivate me to keep writing and sharing my thoughts. Your support means a lot to me.