खोज में निकला था, बाहर उमाकान्त, शब्दों में सच था, पर मन था शान्त। तर्कों के साए में भटका बहुत, पर सत्य न पाया, रहा बस विभ्रांत। बुद्ध ने कहा, “दीपक स्वयं बनो,” विवेकानंद बोले, “खुद को पहचानो।” कृष्णमूर्ति की वाणी गूंजे कहीं, “जो ज्ञात है, बस भ्रम है यहीं।” सत्य न ग्रंथों में, न शास्त्रों की रीत, न वाद-विवाद, न तर्कों की जीत। यह तो बस मौन की भाषा में बसता, हृदय की गहराइयों में ही हंसता। जो भीतर उतरे, वही जान पाए, जो खुद को समझे, वही सत्य पाए। खोलो यह पर्दा, हटाओ यह धुंध, सत्य वहीं है, जहां हो अनुगंध। उमाकान्त
कुछ अल्फ़ाज़ कागज़ पर उतरते हैं, कुछ रिश्तों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। 👇 नीचे स्क्रॉल करें—हर पोस्ट एक नई कहानी, एक नई अनुभूति लेकर आपका इंतज़ार कर रही है। गीत • भजन • ग़ज़ल • कविताएँ • कहानियाँ