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कक्षा दस : उड़ान की शुरुआत | A motivational poem | Class 10 - Udan ki shuruwat

  Todays post : (  Visit: Kagaj Ke Patte – https://kagajkepatte.blogspot.com/ )  कक्षा 10 से 11 की ओर बढ़ता हर कदम केवल अगली कक्षा में प्रवेश नहीं, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत होता है। प्रस्तुत कविता इसी महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का संदेश है। यह उन्हें याद दिलाती है कि कक्षा 11 और 12 केवल दो वर्ष नहीं, बल्कि पूरे भविष्य की नींव हैं। कविता में मेहनत, अनुशासन, समय का सम्मान, धैर्य और निरंतर सीखने की भावना को सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है। हर पंक्ति विद्यार्थियों को यह विश्वास दिलाती है कि कठिन प्रश्न और चुनौतियाँ उनके दुश्मन नहीं, बल्कि सफलता की सीढ़ियाँ हैं। कक्षा दस है मोड़ ज़िंदगी का, शुरुआत यहाँ से उड़ान की, मेहनत का रस पी जो ले, खुल जाएं राहें सम्मान की। ग्यारह–बारह बस दो कदम हैं, जो तय करें भविष्य की राह, पढ़ना समझना गहराई से, यही सफलता का है गवाह। सवालों से मत डर बेटा, हर प्रश्न है एक साथी तेरा, जो हल करेगा धैर्य रख, जीत लेगा संसार सारा। समय को जो देता सम्मान, वो पाता है ऊँचा स्थान, जो ध्यान भटकाए मन का दीप, उसे मिलता संघर्ष...

ई-अवशेषों का पुनर्जन्म - A poem about revolution in sustainability E-Waste recycling ,

ई-अवशेषों का पुनर्जन्म ई-अवशेषों का भी मुक़द्दर बदल सकता है, टूटे उपकरणों में भी नव अंकुर पल सकता है। लोहे की नीरव देह में हरित कली मुस्काई, मौन पड़ी मशीनों में फिर जीवन-धुन समाई। जहाँ कभी थे तार, सर्किट और धातु के निशान, आज वहीं महक उठा है हरियाली का वरदान। ई-अवशेषों ने सिखलाया , कुछ भी नहीं बेकार, हर अंतिम पड़ाव में छिपा होता नव संसार। जो कल था परित्यक्त, आज सृजन सँवारता है, हर जंग लगा कण भी, उम्मीदें सँजोता है। आओ हम भी देखें हर टूटन में नवप्रभात, कुछ भी नहीं व्यर्थ जग में, यदि दृष्टि नई हो साथ। हर ई-अवशेष के अंतर में सोया है नवप्राण, हर अंत की गोद से जन्मे, जीवन का नव विहान।

चल अकेला

  आया था इस जग में अकेला, ना कोई अपना, ना कोई मेला। फिर अनगिन रिश्तों के फूल खिले, जीवन-पथ पर अपने मिले। हर संबंध ने हौसला बढ़ाया, हर आँसू को चुपके सहलाया। हँसी भी बाँटी, ग़म भी बाँटे, अपनेपन के दीपक थे जलते। कुछ रिश्ते समय की धूल हुए, कुछ सपने अधूरे फूल हुए। कुछ चेहरे यादों में बस गए, कुछ पल आँखों से बरस गए। फिर भी जीवन यही सिखाता, हर बिछड़ना कुछ कह जाता। यादों की खुशबू साथ रहती, हर धड़कन में चुपचाप बहती। दुःख भी रिश्तों से, सुख भी वही, जीवन का सार छिपा है यहीं। मिलना-बिछड़ना जग की रीत, इन्हीं में बसती जीवन-गीत। जब राह लगे सुनसान, अकेली, मत होने देना हिम्मत ढीली। जो साथ मिले, प्रभु का वरदान, हर अपना उसका ही सम्मान। कर्मपथ पर बढ़ते ही जाना, सत्य, प्रेम का दीप जलाना। प्रभु का हाथ जो संग रहेगा, हर दुःख, हर झमेला मिट जाएगा। उमाकान्त

अब ससुराल संवारना

विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो हृदयों के स्नेहपूर्ण मिलन का उत्सव है। कन्यादान के पावन क्षण में माता-पिता के मन में उमड़ती भावनाओं को शब्द देना आसान नहीं होता। "ओ समधी जी... ओ समधन जी..." उसी भावभूमि से जन्मी एक मौलिक रचना है, जिसमें बेटी के प्रति असीम स्नेह, उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना और समधी-समधन से उसे प्रेमपूर्वक अपनाने का विनम्र अनुरोध व्यक्त किया गया है। यह गीत केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि विश्वास, अपनत्व और रिश्तों की गरिमा का भावपूर्ण संदेश है। आशा है कि इसकी पंक्तियाँ आपको भी उन अनमोल क्षणों से जोड़ देंगी, जहाँ विदाई के आँसू और नए जीवन की मुस्कान एक साथ खिल उठते हैं। प्रस्तुत हैं इस भावपूर्ण विवाह गीत के सम्पूर्ण बोल दोहा :  बिटिया सुख की छाँव है, बिटिया जीवन प्राण आज समर्पण कर रहे,  करके कन्यादान गीत ओ समधी जी......ओ समधन जी ..... हम पर इक,         उपकार करो । बड़ा कठिन है, ये क्षण जीवन का ,  दिल से दिल का,         दान करो ।। बिटिया हमारी लाडली , सबके आँखो...

माँ-बाप का जीवन, त्याग की कहानी

 प्रेम का असली अर्थ माँ-बाप का जीवन, त्याग की कहानी, हर सुख-स्वप्न छोड़े, बस बच्चों की रवानी। हर चाहत भूले, अपना सब कुछ खोया, उनके लिए हर दिन, हर सपना संजोया। प्रेम ना है आशा, ना कोई अधिकार, ये बस है देना, निस्वार्थ अपार। आभार और समझ जब रिश्तों में आए, सुख-शांति के दीपक जीवन में जगमगाए। बच्चे समझें हक़, बस लेते ही जाएँ, पर कर्म से रिश्ते की गहराई बढ़ाएँ। ऋण ये नहीं, है ईश्वर का वरदान, सम्मान ही इसका है सच्चा प्रमाण। माता-पिता भी समझें ये सदा, हर वक्त साथ रहना नहीं है वादा। अपेक्षा हो सीमित, विश्वास रहे साथ, यही है रिश्तों की सच्ची परिभाषा। प्रेम ना है आशा, ना कोई अधिकार, ये बस है देना, निस्वार्थ अपार। आभार और समझ जब रिश्तों में आए, सुख-शांति के दीपक जीवन में जगमगाए। निःस्वार्थ और प्रेम हैं गहरे राज़, आत्मचिंतन से खुलते इनके अंदाज़। आशा-अधिकार की बाँधो सीमा, तभी निखरेगी जीवन की गरिमा। उमाकान्त

आओ चलो बातें करें

  आओ चलो बातें करें 🤔😊😂👌😍 आओ, बात करें— कुछ ऐसी,  जो मन का अँधियारा हर जाए। कुछ ऐसी,  जो बुझते रिश्तों में  फिर से उजियारा भर जाए। बात बात ही है,  जो बाती बनकर लौ जलाए, बात वही,  जो बातों-बातों में बवाल मचाए। बात ही है,  जो ढाढ़स बन मन को सहलाए, बात वही,  जो सूत्र बन प्रसून खिला जाए। बात ही है,  जो रिश्तों की नींव बन जाए, बात वही,  जो घर-आँगन में दरारें ले आए। बात ही है, जो पत्थर में भगवान दिखाए,बात वही, जो इंसाँ को हैवान बनाए। बात ही है, जो मरहम बन हर घाव मिटाए,बात वही, जो जीवन भर की पीर जगाए। बात ही है, जो मौन में भी अर्थ जगा दे,बात वही, जो भीड़ में अपनेपन को भुला दे। बात ही है, जो टूटे मन को फिर से जोड़ जाए,बात वही, जो साँसों तक का साथ छुड़ा जाए। इसलिए शब्दों को सोच-समझकर अधरों पर लाना,एक मीठी-सी बात भी किसी का जीवन महका जाना। बात ऐसी बोलिए,  जिसमें प्रेम का सार समाए, शब्द नहीं,  हर वाणी से मानवता मुस्काए। उमाकान्त

काश... मेरी माँ आज भी होती,

काश... मेरी माँ आज भी होती काश... मेरी माँ आज भी होती, अपनी पोती की शादी में ममता से भीगती, कभी सँवारती, कभी दुल्हन-सी सजाती, कभी भीगी पलकों से मुस्काती,  कभी नज़रें चुराकर इठलाती। वर को देख चुपके से मुस्काती, स्नेह से उसके माथे को चूम दुलराती, “ख़याल रखना मेरी बच्ची का...” कहकर, ममता की गठरी में कुछ दुआएँ बाँध जाती। काश... मेरी माँ आज भी होती, तो थककर मैं उसके आँचल में सिमट जाता, दुनिया की आपाधापी से पल भर को दूर, उसकी बाँहों में अपना हर बोझ भूल जाता। जब ज़िम्मेदारियाँ मन पर भारी होतीं, वो माथे पर ममता का चुम्बन रख देती, बिना पूछे मेरे मन की पीड़ा पढ़ लेती, और पल भर में हर चिंता हर लेती। हर रस्म में उसकी आँखें दमकतीं, फेरे देखकर पलकें उसकी भीग जातीं, “कमियाँ मत देखना, बस दुआएँ देना...” कहती, और अपनी दुआओं से हर राह सँवार जाती। उसकी मौजूदगी में कोई ऊँचा स्वर न करता, वो रूठे मनों में भी स्नेह जगा देती, किसी की छोटी-सी भूल को हँसकर टालती, और टूटते रिश्तों में फिर से मिठास भर देती। विदाई की उस करुण घड़ी में, वो मुझे अपने सीने से लगा लेती, मेरी छलकती आँखों को आँचल से प...

आओ मिलकर गीत रचें

आओ मिलकर गीत रचें ग़ज़ल ढली रात, फिर सवेरा भी निकल रहा है, हर एक ज़ख्म चुपके से अब सँभल रहा है। ग़मों के समंदर चाहे बहुत गहरे रहे, उम्मीद का हर इक साहिल बदल रहा है। कुछ लोग बिछड़ गए तो ये गिला भी नहीं, उनकी दुआ का दीपक अभी भी जल रहा है। न शिकवा किसी से है, न किसी बात का मलाल, वक़्त अपने ढंग से सब कुछ बदल रहा है। चलो कि फिर नई राह कोई तलाश करें, हर एक मोड़ पर मंज़िल का दिल मचल रहा है। जो गिर के फिर उठा, वही मुसाफ़िर कहलाया, हर एक ठोकर से इंसाँ सँभल रहा है। आओ मिलकर गीत रचें, दिल से दिल मिलाएँ, हर एक सुर में नया हौसला पनप रहा है। 'उमाकांत' हौसला मत कभी हारना तुम, तुम्हारे साथ हर पल ये कारवाँ चल रहा है। उमाकान्त

मौन की भाषा

खोज में निकला था, बाहर उमाकान्त, शब्दों में सच था, पर मन था शान्त। तर्कों के साए में भटका बहुत, पर सत्य न पाया, रहा बस विभ्रांत। बुद्ध ने कहा, “दीपक स्वयं बनो,” विवेकानंद बोले, “खुद को पहचानो।” कृष्णमूर्ति की वाणी गूंजे कहीं, “जो ज्ञात है, बस भ्रम है यहीं।” सत्य न ग्रंथों में, न शास्त्रों की रीत, न वाद-विवाद, न तर्कों की जीत। यह तो बस मौन की भाषा में बसता, हृदय की गहराइयों में ही हंसता। जो भीतर उतरे, वही जान पाए, जो खुद को समझे, वही सत्य पाए। खोलो यह पर्दा, हटाओ यह धुंध, सत्य वहीं है, जहां हो अनुगंध। उमाकान्त

छोटी सी गुड़िया

छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई कल ही तो गोद में थी, हंसती गाती फूलों सी कोमल कली, आज निडर हो गई। छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई। पलक झपकते ही, ऋतुएँ कितनी बदल गई। कल की नन्ही नन्ही बातें, आज कहानी हो गई। छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई। मेरे सपनों की परी, आज आसमान छूने को है। नन्हा सा पंछी अब, उड़ान भरने को है। अभी तो सुबह थी, कब सांझ हो गई। छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई। याद है वह दिन, नन्हे हाथों से मेरी उंगली थामी थी। दो कदम क्या चली, सुंदर सी चप्पल खरीदी थी। आज मेरी आरज़ू, उसकी हो गई। छोटी सी गुड़िया कब बड़ी हो गई। — उमाकान्त

सफर यही है, मंज़िल यही

  बेहतर बनने की राह खुद को बेहतर करने की चाह में, हर दिन एक कदम बढ़ता है, गलतियों से सीख लेकर, इंसान खुद को फिर से गढ़ता है। शुरुआत होती है खुद से ही, सोच को थोड़ा बदलने से, लफ़्ज़ों में नरमी लाने से, और व्यवहार में अपनापन भरने से। राहें चाहे कितनी मुश्किल हों, हौसले फिर भी थमते नहीं, दूसरों के दर्द को समझने वाले, रिश्तों से कभी दूर होते नहीं। व्यवहार बदलता है धीरे-धीरे, लगातार प्रयास करने से, नई सोच को जीवन की आदत में ढालने से। फिर एक दिन महसूस होता है, कुछ बदला-बदला सा संसार है, लफ़्ज़ों में अपनापन बढ़ता है, रिश्तों में पहले से अधिक प्यार है। जो बदलाव भीतर आता है, वह बाहर भी नज़र आता है, हम जैसा व्यवहार बाँटते हैं, वैसा ही लौटकर आता है। नरमी से नरमी मिलती है, सम्मान से सम्मान बढ़ता है, एक छोटी-सी संवेदनशीलता से, रिश्तों में विश्वास गहराता है। यही जीवन का सार है— खुद को हर दिन सँवारते जाना, सोच में इंसानियत, व्यवहार में अपनापन रखना, और जहाँ से गुजरें, वहाँ अपनेपन की एक खुशबू छोड़ जाना।

दिल सिर्फ दिल से

दोस्त दिल के दरवाजे से आते हैं, मोहब्बत की रौशनी जगाते हैं। दौलत से खरीदे जहां के सभी साजो-सामान, मगर दिल की दौलत से ही, दिलों के दर खुलते हैं। दिल की चौखट पर जब दोस्त आते हैं,  मोहब्बत के दीप वहां जलाते हैं। हर कोना रौशन हो उठता है फिर, जब मुस्कान से जज़्बात सजाते हैं। सोने-चांदी से सजे हैं कई मकान, पर उनमें नहीं वो अपनापन का गान। जो दिल से मिले, वो दिल में बस जाए, वो दौलत नहीं, जो हर दिल को भाए। सजाएं महल या खरीदें ज़मीन, बिन सच्चे जज़्बे, सब बातें अधीन। दिल की दौलत हो, तो रिश्ते भी खिलते हैं, वरना ताले तो दरवाज़ों पर भी मिलते हैं।

तुझे क्या खबर

  तुझे क्या ख़बर… तुझे क्या ख़बर, तुझसे कितना प्यार करता हूँ, हर एहसास छुपाकर, दिल में तेरा घर रखता हूँ। तुझे क्या ख़बर… तुझे क्या ख़बर… जज़्बातों को लफ़्ज़ों में ढालूँ कैसे, हर अल्फ़ाज़ तेरा आईना लगता है। जो बात लबों तक आ न सकी, वो ख़ामोशियों में भी सुनाई देती है। तुझे क्या ख़बर… अगर पढ़ सके तो पढ़ लेना, मेरी आँखों की हर तहरीर। मौन रहकर भी हर पल, तेरी धड़कनों से करता हूँ तक़रीर। तुझे क्या ख़बर… हर लम्हा तेरी याद में यूँ ढलता है, जैसे चाँद रात की बाँहों में पिघलता है। तू दूर होकर भी मुझसे दूर कहाँ, हर साँस में तेरा ही एहसास पलता है। तुझे क्या ख़बर… तू अहसास है मेरी हर दुआ का, तू सुकून है मेरी हर बेचैनी का। तेरे बिना भी जी तो लेता हूँ मगर, क्या नाम दूँ इस अधूरी ज़िंदगी का। तुझे क्या ख़बर… न कोई शिकवा, न कोई गिला, बस तेरा इंतज़ार मुकद्दर है। तू मिले या न मिले इस सफ़र में, तुझसे मोहब्बत ही मेरी मंज़िल है। तुझे क्या ख़बर… तू ही नूर है, तू ही सुकून मेरा, तुझसे ही मेरी हर सुबह, हर शाम। मैं ख़ुद को भूल भी जाऊँ अगर कभी, दिल फिर भी लेता है तेरा ही नाम। तुझे क्या ख़बर, तुझको मैं कितना, अपनी ...

खींची मैंने रेखा पे रेखा

 पूजा बत्ती करली मैंने  मंदिर भोग लगा आया, लोगों को मन्तर आता नहीं मैंने तो मन्तर भी गाया  कर दान रुपे दो मंदिर में, मैं दानवीर भी कहलाया। दोष दिखें  औरों में मुझको , मेरी तो निर्दोषी काया ,  नही क्रोध मुझ में थोड़ा भी , पर औरों पे गुस्सा आया , अहम नही मुझ में बोलो मैंने तो मैं को ही पाया ज्ञान बहुत मुझ में मगर औरो में भूसा देखा अहम के जंजाल में फंस, खींची मैंने रेखा पे रेखा

पक्का धागा

पक्का धागा बहन चाहे जितनी भी दूर हो,  भाई को नहीं भूलती । भाई के मन में भी बहन हमेशा,  हिलोरे लिये झूलती । बंधन है यह पक्के धागे का, बहन बेटी मन के रागों का,  कलाई अपने आप उठकर  अपने माथे को चूमती ॥ बहन और बेटी को शत-शत नमन हैप्पी रक्षा बंधन 

रिश्ते ही जीवन का संगीत

 कुछ लोग कड़वी यादों को सीने में छुपाते हैं, बस रिश्तों को तोड़ने के बहाने बनाते हैं। कुछ लोग मीठी बातों से दिल को सजाते हैं, हर लम्हे को रिश्तों का पर्व बनाते हैं। रिश्ते ही तो जीवन का है संगीत  इन्हीं से हर धड़कन में है प्रीत। जो रिश्तों को शतरंज की बिसात मान लेते हैं, विश्वास को मोहरे की तरह चला जाते हैं, शतरंज में जीता जा सकता है, पर रिश्तों में अक्सर  दिल की बाज़ी हार जाते हैं।

आनंद

 तुम खुश हो अपनी किसी खुशी में,  ये साधारण सी बात  है आनंद की बात यह है कि आपकी खुशी में दूसरे लोग फूले ना समाएँ 

खुद से दूर

आदमी पास होकर भी, दूर हो जाता है दूर हो , पास होने के लिए तरसता है अजीब सी दुनिया है तेरी भगवन खुद ही खुद से दूर हो जाता है

बात बात पे

मैं तेरी बात पे, तू मेरी बात पे , और , बात एक ही है मैं कुछ कह रहा था, तू कुछ सुन रहा था, तू कुछ कह रहा था, मैं कुछ समझ रहा था। और फिर... हम दोनों इस मुगालते में थे, कि हम एक-दूसरे से लड़ रहे हैं, जबकि लड़ाई बस अहं से थी — बात तो अब भी वहीं की वहीं थी।

चार भाई तीन बहन

चार भाई, तीन बहन चारों दिश सत्संग  प्रेम पताका  लहरा रही  चौतरफा बरसे रंग  हे प्रभु ! बहती रहे जलधार  ना हो कोई अंत  खुशियां अनगिनत  उमड़े आनंद अनंत 10.03.2020

खजाना

जहां खोजने चला तू ख़ज़ाने को, घर छोड़ आया वह ख़ज़ाना तो ज़माने को। जिस ममता ने तुझको चलना सिखाया, तू छोड़ आया वही आँचल के तराने को। जो आंखें बरसों तेरी राह तकती रहीं, तू अकेला छोड़ आया उनके अफ़साने को। सांसों में उनकी अब तेरा ही नाम है, पर तू भुला बैठा उनकी उस दीवानेपन को। दौलत की चमक में वो सुकून न मिलेगा, जो छोड़ आया तू अपने पुराने ठिकाने को। 02.05.2020

कवि नवाब केसर

विरासते अलीगढ में जब खिला वो  गुलाब  हर शख्स ढूंढ रहा जटिल प्रश्नों के जवाब हृदय सरल हो तो जटिलता कहां  गौर से देखो जवाबों में हमारे नवाब भावों से भरी हो जिंदगी  तो हर दिल में बजे रवाब कवि हो या उसकी कविता  कहीं ना कहीं है हमारे केसर नवाब 01.07.2020

पिता की नम ऑखें

क्या कहती है यह आंखें  क्या बोले यह मन  कुछ दिनों का पहरेदार हूं भाइयों  कर लो प्रेम मिलन । याद रखेगी दुनिया,  गर याद रखोगे तुम  मन से ही मन को समझ लो ,  शब्दों का करो दमन  जीवन है छोटा सा भैया, खुशियों की घड़ियां बटोर लो  इस कड़वी दुनिया में,  कुछ मीठे पल बिखर लो फोन करोगे मुझको तो, आशीष ही मिलेगा  लेकर कुछ जाना नही , सब तुम्हें ही मिलेगा  समझ समझ में कुछ नहीं बिना समझे ही दिल लगा ले  कुछ क्षण मुझको दे दो  थोड़ा मुझ में मन लगा ले  21.12.2017

सवाल और जवाब

ज़िंदगी में सवाल भी देखे, और जवाब भी देखे।  ऐ मशक्कत भरी ज़िंदगी, जवाबों की जगह,  इल्ज़ामों के हमले हज़ार देखे।  सुना था ज़िंदगी कभी, नासूर बन जाती है,  हक़ीक़त में, बदलते सवाल और जवाब भी देखे।  अब तो हर सवाल पर मुस्कुरा देते हैं,  क्योंकि बदलते वक़्त के साथ जवाब बदलते देखे।

धुन

आज भी जिंदगी  तुम्हारे हाथ में है  कल भी थी और कल भी तुम्हारे हाथ में है परिभाषा तुम दोगे  जिंदगी तो को तो, अपनी धुन में चलना है

कश्मकश

  जिंदगी दो पडावों के  कश्मकश में  गुजराती चली गई   एक अभी उम्र नहीं और  दूसरी अब उम्र नहीं 26.12.2017 उमाकांत

हमारे प्यारे बाऊजी

  शशि उमा और चंद्र रमा, जब   चरों भाई मिल जाये । मन   ही   मन बाउजी, को फुले   ना   समायें  ॥ हमरे   प्यारे   बाउजी, सबसे   न्यारे बाउजी । हमारे   अच्छे    बाउजी, सबसे   सच्चे   बाउजी ॥  समय बदला तो वो भी बदले, समय के साथ जाएँ । आधुनिक ज़माने से भी, सामंजस्य बिठायें ॥ हमारे   प्यारे   बाऊजी ........ बहुओं   को   भी   बेटी   माना, पर्दा   प्रथा   हटाई । मात्र रूप सँजोकरके, प्रीत   की    रीत   जगाई ॥ हमारे प्यारे   बाऊजी ........ उतर दक्षिण   पूरब   पश्चिम, चार   दिशा   चार भाई । चहुँ   दिशा में फैली है, इस बगिया की परछाई ॥ हमारे   प्यारे   बाऊजी ........ कृष्णा सरोज औ उषा भी, और भुआजी आजायें इस घर की खुशहाली में, चार चाँद लग जाए ॥ हमारे   प्यारे   बाऊजी ........ पूर्व जन्म के शुभ कर्मों से, ये आशीष है पाया । धन्य धन्य ओ बाउजी,      धन्य आपकी   माया...

खत मिला जब तेरा

खत मिला जब तेरा "सजनी",  लिखने का मन हो गया खुली आँखो ने देखा सपना,    मन कही मेरा खो गया   मन करता है, सब कुछ लिख दूँ लिख दूँ आहट - करवट - लिख दूँ पल पल की बेचैनी लिख दूँ लिख दूँ चाहत, तरसट लिख दूँ जब मैने पढ़ा तेरा प्रेम रागना, अखियों से झरना बह गया खुली आँखो ने देखा सपना,  मन कही मेरा खो गया   खत मिला जब तेरा "सजनी", लिखने का मन हो गया कैसे कटेंगी रातें “और” कैसे बीतें दिन, तेरे खयालो में सजनी, काटे दिन गिन गिन खत मिलते ही तेरा सजनी, होश हमारा खो गया ओ सजनी तेरे प्यार में पागल, मैं दीवाना हो गया खत मिला …   कब आई तू दिल में मेरे,  कब धड़कन में समा गयी दिन दहाड़े दिल में घुस कर,  चैन चुराकर ले गयी रपट लिखाउ किस थाने में,  दिल चोरी रे हो गया ओ सजनी तेरे प्यार में पागल मैं दीवाना हो गया खत मिला …

शुभ आशीष

  मेरे सीधे साज, ओ मेरे मीठे संगीत मेरी सरगम, मेरी रागिनी ऐ मेरे सुरीले गीत   मेरे जतन, ओ मेरी साधना मेरी कोशिश, मेरी भावना ए मेरी निश्छल जीत   मेरी खुशबू ओ मेरे फूल मेरी नींव, 'मेरे मूल ए मेरी सर्वग रीत   मेरी लगन, ओ मेरी शमा मेरे भविष्य, मेरे वर्तमा: ए सुन्दर स्वप्निल अतीत   मेरे मन की ज्योती, ए मेरे मन के मीत मेरी चीनू ओ मेरी मीनू ए मेरे परम् प्रीत   खुश रखेंगे सदा, मेरे ईश्वर मेरे ईश तीक्ष्ण तरंगें निकल रही है बन कर शुभ आशीष 

मनवीणा

    दीवाली पे तूने जो दीप जलाया है खुश होकर खुद लक्ष्मीजीने 'तेरा दर सजाया है।   सुन्दर साँवली सलोनी सी. ‘शालीन’ सजल सम कोयल सी, उस ‘आलोकित’ दीप की ज्योती ने, उस मादक मन की मोहनी ने, हर मन महकाया है खुश होकर   …   अरे, राजयोग लेकर आयी वो खुद बनेगी शहनाई घुटमन दोडेगी आँगन में किलकारी गूंजेंगी दामन में अब खुशीयों की छाया है खुश होकर …   दादी की बनेगी वो ताई अपनी मम्मी की परछाई पुलकित मन की मनवीणा सूंदर हाथों वो हिना हर सुर समाया है खुश होकर …

पैगाम

  भ्रम था अभी तक हमें    “कि" दिल हमारा हमारे पास है महसूस हुआ आज        “कि" हिया कोई और लिये बैठा है   पेबंद किताब की तरह, हम तो बिके चले जारहे थे मालूम हुआ आज,      “कि” पहले से कोई और पढ़े बैठा है   बेलगाम घोड़े की तरह, बढे जा रहे थे जिन्दगी की राहों में ठिठरे हुए लमहो ने बताया “कि” लगाम कोई और थामे बैठा है   मशगुल थे हम तो नौकरी पेशे के प्रश्न ऐ जवाबो में अहसास हुआ आज “कि” प्यार का ये अहसास, कोई पैगाम लिये बैठा है

तुम हो

  हुस्न की परी हो तुम दिल की मलिका हो तुम चाहत की कड़ी तुम हो, तुम हो, तुम हो   मेरे ख्वाबो की रानी, महकती जवानी मेरे जीवन की कहानी तुम हो, तुम हो, तुम हो   गर्मी की जलन, जाड़े की तड़प फूलो की महक, पंछी की चहक सावन की बरखा तुम हो तुम हो तुम हो   उमाकान्त भवानी रूप सयानी , बंक बावरी और थोड़ी रूमानी तुम हो तुम हो तुम हो

तेरी मुस्कान

  तेरी मुस्कान अब, इस दिल में समा गयी अँधेरी रातो में, रोशनी छा गयी   पहली मुलाकात में, शर्माए थे हुज़ूर शर्मा के थोड़ा मुस्काये थे जुरूर वो मुस्कराहट क्या गुल खिला गयी अँधेरी रातो ….   मिलके अभी दूर हुए, फिर भी मचलता है जिया कैसे कहूं, क्या मैं कहूं, जैसे बिन बाती दिया वो अगन सब, दीप जला गयी   अँधेरी रातो …

गीत : चांदनी चुरा कर

  दो दिन   दो दिन मिलकर हाए 'सनम" दीवाना कर गये पानी दिखा कर वो, प्यासा ही छोड गये   कहते थे चांद हो तुम, सितारे भी ना रहे, चाँदनी चुराकर 'सनम’, अंधेरा.. अंधेरा कर गये दो दिन मिलकर …   वादे किये हजार हाए, वो वादे कहाँ गये, चले थे मिलकर साथ, अकेला छोड गये। दो दिन मिलकर …   कैसे थे पहले "और अब", क्या से क्या हो गये जीने की चाह है, 'मगर' जीने लायक ना रहे   लिखा नहीं था कभी, आज लिखते चले गये " उमा " गजल सुनकर 'सनम', वापस तो आ गये।   बिछड़े हुए दो प्रेमी आज एक होगये चादनी जो चांद को मिली, सितारे खिल गये